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सात दोहे – '' रिश्ते ''

*******    ******

नाराजी जो है कहीं , मिल के कर लो बात

खामोशी  देती  रही , हर  रिश्ते  को मात

 

रिश्तों  को  भी चाहिये , इन्जन जैसे तेल

बिना  तेल  देखे बहुत , झटके खाते मेल                            

 

तेरा  घोड़ा  तेज़  है , माना  मेरा  सुस्त

देखो  रिश्ता  हो  गया , पहले जैसे चुस्त

 

तू  माने  खुद को बड़ा , तो मैं भी हूँ शेर

बढ़ने  में  अब  दूरियाँ , नहीं लगेगी  देर

 

आपस की  कमियाँ भरें , यारी की  ये रीत

यही बढ़ाती  है  सदा , हर  नाते  में प्रीत

 

हाथ मिला के कब हुआ, मन से मन का मेल

ये भावों की बात है , ये अन्दर का खेल

 

मैं जैसा भी हूँ अभी , जो कर ले स्वीकार

उसकी सारी ग़लतियों, से मुझको भी प्यार   

***********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2014 at 11:11pm

आदरणीया कल्पना जी , दोहों की सराहना कर उत्साह वर्धन करने के लिये आपका हार्दिक आभार

Comment by कल्पना रामानी on February 25, 2014 at 11:02pm

बहुत सुंदर दोहे आदरणीय गिरिराज जी, मन से बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2014 at 10:51pm

आदरणीय बृजेश भाई , दोहों की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by बृजेश नीरज on February 25, 2014 at 10:24pm

अच्छे दोहे हैं! आपको हार्दिक बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2014 at 6:20pm

आदरणीया सरिता जी , दोहों की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

Comment by Sarita Bhatia on February 25, 2014 at 2:29pm

रिश्तों की अहमियत लिए खुबसूरत दोहे ,बधाई आदरणीय 

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