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किसी के दिल को छू पाया

2122  2122  2122  2122

राज की बात कहता हूँ समझ अब तक न तू पाया ।
सुकूँ देकर किसी को ही आदमी ने  सुकूँ  पाया ।

दौलतें शोहरतें जिनको कमानी हैं क़मा लें वो ,
मुझे इतना बहुत है जो किसी के दिल को छू पाया ।

बढ़ाये हाथ जब मैंने किसी को थाम लेने को ,
ख़ुशी का सिलसिला दिल में अचानक ही शुरू पाया ।

यहाँ हर शै से हर शै का एक अनबूझ रिश्ता है ,
जब दिल में चुभा काँटा तो आँखों में लहू आया ।

ढूँढ़ने ज़िन्दगी का राज मै जिस रोज से निकला ,
जहाँ के जर्रे जर्रे में नज़र मुझको गुरु आया ।

न था जब तक कहीं ना था अब है तो ये हालत है ,
नज़र को होते हर शै में खुदा से रुबरु पाया ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज 'प्रेम '

Views: 562

Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 8, 2014 at 9:37am

आदरणीय नीरज भाई ..आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ ..कई रचनाएँ पढी ..भाव बहुत अच्छे हैं रही बात शिल्प की तो तो उसपर बिद्व्त्जानो ने लिखा ही है ..बिद्व्त्जनो के साथ हम साझा प्रयास से सीख रहे हैं वाकई ये अद्भुत मंच है इस मंच से हम जुड़े हैं ..यह हम सबके लिए सुखद है ..आपकी रचना पर ढेर सारी बधाई के साथ ..सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 11, 2014 at 6:53pm

कई मिसरे बेबहर लग रहे हैं आ० नीरज मिश्रा जी 

ग़ज़ल की कक्षा में तक्तीह के भी उन्नत पाठ हैं अन्य आलेख है, उन्हें अवश्य देखें

बहराल इस प्रयास पर बधाई लें 

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 10, 2014 at 9:12pm

 प्रयास अच्छा है , गुणीजनो के बातो पर अमल करने पर परिणाम यथेष्ठ होगा । शुभ शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 10, 2014 at 6:26pm

आदरणीय नीरज भाई , लाजवाब बातें नही है आपने हर शे र में , मगर आपने जो बह्र उपर मे दिया है उसमे सभी शे र नही कह पाये हैं ,

आपकी गज़ल ,1222   1222   1222  1222  के भी बहुत करीब है , चाहें तो इसी बह्र के अनुसार सुधार कर सकते हैं ॥

Comment by ram shiromani pathak on February 10, 2014 at 4:33pm

भाव बहुत सुन्दर है ग़ज़ल के हार्दिक भाई नीरज जी  ....सादर

Comment by coontee mukerji on February 10, 2014 at 3:44pm

ढूँढ़ने ज़िन्दगी का राज मै जिस रोज से निकला ,
जहाँ के जर्रे जर्रे में नज़र मुझको गुरु आया ।....बहुत सुंदर...हार्दिक बधाई.

Comment by Meena Pathak on February 10, 2014 at 2:34pm

सुन्दर प्रयास हेतु बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 10, 2014 at 1:40pm

आदरणीय नीरज भाई आपके द्वारा लिखे गए वज्न पर ग़ज़ल खरी नहीं उतरती, मतला ही बेबह्र हो गया अब आपको थोडा गंभीर होना पड़ेगा पोस्ट करने से पहले स्वयं ही जांच कर लें संतुष्ट हो जाएँ.

2 1  2  2/   1  2  2 2 / 1  2   2   2     / 1  2  2 2

राज की बा / त कहता हूँ/ समझ अब तक/  न तू पाया ।

1 2  2 2  /1 2   2   2  / 2 1 2  2  / 1 2  2 2
सुकूँ देकर /किसी को ही /आदमी ने  / सुकूँ  पाया ।

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