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ग़ज़ल- सारथी || हुआ है आज क्या घर में ||

हुआ है आज क्या घर में हर इक सामान बिखरा है

उधर खुश्बू पड़ी है और इधर गुलदान बिखरा है /१ 

मुहब्बत क्या है ये जाना मगर जाना ये मरकर ही

लिपटकर वो कफ़न से किस तरह बेजान बिखरा है /२ 

यहीं मैं दफ्न हूँ आ और उठाकर देख ले मिट्टी

मेरी पहचान बिखरी है मेरा अरमान बिखरा है /३ 

मुझे रुस्वाइयों का गम नहीं गम है तो ये गम है

लबों पर बेजुबानों के तेरा एहसान बिखरा है /४ 

ग़ज़ल के वास्ते मैं फिर नई पोशाक लाया हूँ

अलग ये बात पुर्जों में मेरा दीवान बिखरा है /५ 

.............................................................
अरकान : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ 

सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Saarthi Baidyanath on February 5, 2014 at 10:30am

नवाजिश , करम , मेहरबानी  अनिल कुमार 'अलीन'  साहब ! शुक्रिया बहुत बहुत ! स्वागतम !

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 5, 2014 at 9:50am

इबादत में है मेरी माँ , यहाँ की रौनकें देखो

मकां के गोशे गोशे में, कई भगवान बिखरे हैं /२...........बहुत खूब जनाब..........

Comment by Saarthi Baidyanath on February 2, 2014 at 7:24pm

परम आदरणीय  Saurabh Pandey जी , चरण वंदन इस स्नेहिल व आत्मिक प्रतिक्रिया हेतु ! स्नेहाशीष देते रहिएगा ! कोटिशः आभार श्रीमान ! :)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 2, 2014 at 7:10pm

भाईजी.. दिल खुश कर दिया आपने ! .. ढेर सारी दाद और हार्दिक बधाइयाँ ..

शुभ-शुभ

Comment by Saarthi Baidyanath on January 30, 2014 at 6:23pm

महोदया rajesh kumari जी , नतमस्तक हूँ ! कोटिशः चरण वंदन ! आपके सहज निश्चल स्नेह ने भाव विभोर कर दिया है , आपने तो ऋणी बना दिया हमें, अपने स्नेह से ! शीशनत हूँ आदरणीया  ..शीशनत हूँ ! विनम्र अभिनंदन आपका ! सादर -सारथी ! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 30, 2014 at 5:36pm

इबादत में है मेरी माँ , यहाँ की रौनकें देखो 
मकां के गोशे गोशे में, कई भगवान बिखरे हैं /---------लाजबाब मोती मणिक न्योछावर  इस शेर पर 

जहां मैं दफ्न था जाओ ,उठाकर देख लो मिट्टी 
मेरी पहचान बिखरी है ,तेरे एहसान बिखरे हैं -----आह्ह्ह ये क्या लिख दिया ....दिल रो पड़ा 

हर शेर दिल को चीर कर निकल रहा है यही इस ग़ज़ल की खासियत है ---ढेरों दाद कबूलिये सारथि जी ...शुभकामनायें 

Comment by Saarthi Baidyanath on January 30, 2014 at 5:16pm

जनाब  अरुन शर्मा 'अनन्त' साहब , आपके स्नेह से सचमुच प्रेरणा मिलती है ! कुछ और अच्छा करने /लिखने को आतुर हो जाता है मन ! बहुत मेहरबानी आपकी ! शुक्रिया बहुत बहुत ..साथ बने रहिएगा आदरणीय ! आकांक्षी :)

Comment by Saarthi Baidyanath on January 30, 2014 at 5:14pm

आदरणीय  बृजेश नीरज जी , आपके शुभागमन से आनंदित हूँ ! स्नेहिल टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार आपका ! सादर प्रणाम !

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 30, 2014 at 2:11pm

भाई वाह वाह वाह एक एक शेअर पर दिल से भर भर के ढेरों ढेरों दाद सारथी भाई दिल लूट लिया आपने मुग्ध कर दिया. भाई मजा आ गया वाह वाह वाह क्या खूबसूरत चमचमाते हुए अशआर हैं सितारे जड़े हैं भाई मुकम्मल कामयाब हासिले ग़ज़ल.

Comment by बृजेश नीरज on January 30, 2014 at 12:05pm

अच्छी ग़ज़ल है भाई जी! आपको हार्दिक बधाई!

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