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मसूरी के हिमपात पर

बर्फ की ये चादरी सफ़ेद ओढ़कर
पर्वतों की चोटियाँ बनी हैं रानियाँ
पत्ती पत्ती ठंड से ठिठुरने लगी,
फूल फूल देखिये हैं काँपते यहाँ ।

काँपती दिशाएँ भी हैं आज ठंड से,
बह रही हवा यहाँ बड़े घमंड से ।
बादलों से घिरा घिरा व्योम यूं लगे,
भरा भरा कपास से हो जैसे आसमाँ।। पर्वतों की .....


धरती भी गीत शीत के गा रही,
दिशा दिशा भी मंद मंद मुस्कुरा रही।
झरनों में बर्फ का संगीत बज उठा,
और हवा गा रही है अब रूबाईयाँ॥ पर्वतों की .....

पंछी हैं की नीड़ से निकलते नहीं,
जानवर भी ठंड में मचलते नहीं ।
इंसान का ये सौंदर्य प्रेम देखिये,
दूर दूर से चले हैं घूमने यहाँ ॥ पर्वतों की .....

चूम रही चोटियाँ भी आसमान को,
प्रेम का संदेश दे रही जहान को।
क्षितिज पर धरा गगन यूं मिल रहे,
रति का मदन से ज्यों मिलन हो गया॥ पर्वतों की .....


प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 1, 2014 at 2:13am

भाई प्रदीपजी, आपकी काव्य प्रतिभा से परिचित कराती यह कविता सुन्दर बन पड़ी है, कुछ तथ्य अवश्य हैं जिनका जान लेना आपके कथ्य को गहन कर देंगे. लेकिन अभी बस बधाइयाँ स्वीकारिये.
हार्दिक शुभेच्छाएँ.
 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 27, 2014 at 4:26pm

मंसूरी की बर्फ से घिरी वादियों में कुदरत प्रदत्त प्राकृतिक सौन्दर्य में मग्न कवि हृदय से निस्सृत झूमता झूमता गीत 

बहुत सुन्दर शब्दों में प्रकृति की ख़ूबसूरती को कैद किया है... आ० प्रदीप बहुगुणा जी.

हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by Pradeep Bahuguna Darpan on January 24, 2014 at 8:52pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी व अरुन शर्मा 'अनन्त' जी आपकी मूल्यवान टिप्पणियों के लिए बहुत बहुत आभार ..... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 24, 2014 at 5:35pm

आदरणीय प्रदीप भाई , बहुत सुन्दर प्रकृति वर्णन किया है आपने , आपको बधाइयाँ ॥

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 24, 2014 at 4:52pm

भाई प्रदीप जी मसूरी में सर्दी के मौसम में होने वाली छोटी छोटी बातों का बहुत सुन्दर वर्णन किया है आपने. रचना अच्छी लगी बधाई स्वीकारें.

कृपया ध्यान दे...

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