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स्वार्थ और प्यार

"स्वार्थ और प्यार "


मानव बिकाऊ है जमी पर , मानवता की आड़ में।
ईमान बिकता है यहाँ पर , धर्म जाए भाड़ में ।।
भ्रष्टाचार का खू लगा है ,हर मानव की दाड़ में।
ऐसा बिगाड़ा इंसा जैसे ,बच्चा बिगड़ता लाड़ में।।
स्वार्थ की खातिर बेचा देश , दुनियाँ के बाजार में।
वतन किया नीलाम देखो ,मानव के सरदार ने।।
प्यार कभी न बजता यारों ,खुदगर्जी के साज में।
और कभी न स्वार्थ टिकता ,दिलबर के दरबार में।।
इन दोनों का साथ तो जैसे ,जल पावक के साथ में।
या निकला हो सूरज कोई , अमावस की रात में।।

.

मौलिक व अप्रकाशित
चौथमल जैन

Views: 871

Comment

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Comment by बृजेश नीरज on January 17, 2014 at 7:38am

बहुत अच्छा प्रयास है! आपको हार्दिक आभार!

टाइपिंग की समस्या धीरे-धीरे अभ्यास के साथ दूर हो जाएगी!

आदरणीय, हिंदी रचना लिखते समय 'खून', 'इंसान'  ही लिखना उचित होता है. 

Comment by chouthmal jain on January 17, 2014 at 1:20am

माननीय श्यामनारायण जी वर्मा , बहिन मीना पाठक , माननीय गणेश जी बेगी , माननीय अखिलेश कृष्ण जी श्रीवास्तव , बहिन कुन्ती मुकर्जी , माननीय राम शिरोमणि पाठक जी , माननीय गिरिराज जी भंडारी ,बहिन अनुपमा वाजपेई ,माननीय नीरज कुमार जी नीर ,माननीय सौरभ जी पाण्डे ,माननीय रमेश कुमार जी चौहान , माननीय जितन्द्र जी गीत आप सभी को बहुत -बहुत धन्यवाद | मैं आपका आभारी हूँ |  साथ ही क्षमा चाहता हूँ , टाइपिंग का ज्ञान कम होने के कारण लिखने में मुझे बहुत समय लगता है ,और तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दे पाता हूँ | 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 16, 2014 at 11:03pm

भ्रष्टाचार का खू लगा है ,हर मानव की दाड़ में।
ऐसा बिगाड़ा इंसा जैसे ,बच्चा बिगड़ता लाड़ में।।

बहुत बढ़िया रचना, आदरणीय बधाई स्वीकारें

Comment by रमेश कुमार चौहान on January 16, 2014 at 10:40pm

मानव बिकाऊ है मानवता की आड़ में।
बिकता ईमान है धर्म जाए भाड़ में ।।

बहुत बहुत बधाई आदरणीय चौथमल जैन जी |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 10:12pm

आपकी कोशिशों के लिए बधाई.  प्रयासरत रहें.

शुभेच्छाएँ

Comment by Neeraj Neer on January 16, 2014 at 7:56pm

बहुत खूब भाव..

Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 7:02pm

sundarसुंदर भाव , अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकारें । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 15, 2014 at 9:05pm

मानव बिकाऊ है जमी पर , मानवता की आड़ में।
ईमान बिकता है यहाँ पर , धर्म जाए भाड़ में ।। -------- बहुत बढ़िया भाई चौथ मल जी , बधाई ॥

Comment by ram shiromani pathak on January 15, 2014 at 6:32pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय  ……  हार्दिक  बधाई आपको

Comment by coontee mukerji on January 15, 2014 at 5:25pm

सुंदर रचना के लिये हार्दिक बधाई

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