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१.      “ मैं ”

 

मैं-मैं तू करके हुआ, भौतिक सुख में लीन

अहम् भाव और देह की, रहा बजाता बीन

रहा बजाता बीन , नहीं  ‘मैं’ को पहचाना  

परम तत्व को  भूल ,जोड़ता रहा खजाना    

क्या  दिखलाकर दाँत,  करेगा केवल हैं हैं ?

जब पूछें यमराज, कहाँ बतला  तेरा  मैं ||

 

२.      “ तुम “

 

तुम-मैं मैं-तुम एक है , परम ब्रम्ह का अंश  

जाति- धर्म  इसका नहीं , और न कोई वंश

और न कोई वंश ,यही तो अजर - अमर है

अविनाशी  है  रूह , और  काया  नश्वर है

कर इसका अहसास,ह्रदय में रुमझुम रुमझुम

परम ब्रम्ह का अंश , एक है तुम-मैं मैं-तुम ||

 

३.      “ हम “

 

‘हम’ नन्हा-सा शब्द है,अणु जैसा ही जान

शक्ति कल्पनातीत है,‘हम’ से कौन महान

‘हम’ से कौन महान, एकता का परिचायक

‘हम’ देता सुख शांति, रहा हरदम ‘हम’ नायक  

जीना सब के साथ , नहीं  रहना तन्हा-सा

अणु जैसा ही जान,शब्द है ‘हम’ नन्हा-सा ||

 

 

अरूण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

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Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 6:05pm

आ0 अरुण कुमार जी संदेश युक्त  कुण्डलिया के लिए आपको तहे दिल से बधाई । 

Comment by ram shiromani pathak on January 14, 2014 at 9:21pm

बहुत सुन्दर कुंडलियां आदरणीय अरुण निगम जी। । हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 14, 2014 at 4:13pm

आदरणीय अरुणजी, आपकी यह छंद-रचना कई मायनों में सार्थक है. इनके माध्यम से संज्ञा-इंगितों को परिभाषित करने का सुन्दर प्रयास हुआ है. वहीं, भावदशा को गहनता से साझा किया गया है.
आपको बार-बार बधाइयाँ और असीम शुभकामनाएँ
सादर

Comment by Maheshwari Kaneri on January 11, 2014 at 1:30pm

अरूण कुमार जी बहुत बढिया..

Comment by रमेश कुमार चौहान on January 10, 2014 at 10:27pm
मै, तुम और हम तीनों को आपने सुंदर परिभाषित किया है, भैय्याजी आपने सच मानिये अंर्तमन भाव विभोर हो गया । बधाई बधाई आपको
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 10, 2014 at 12:40pm

उच्च भाव लिए तीनों छंद कुण्डलिया की हार्दिक बधाई अरुण भाई॥

Comment by कल्पना रामानी on January 9, 2014 at 10:45pm

तीनों  छंद सार्थक संदेश देते हुए बहुत सुंदर हैं। हार्दिक बधाई आपको आदरणीय अरुण निगम जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 9, 2014 at 12:53pm

अय हय हय आदरणीय गुरुदेव श्री जय हो आपकी मुग्ध हूँ मैं, तुम और हम की परिभाषा से. तीनो ही कुण्डलिया छंद हृदयस्पर्शी हैं सुन्दर सन्देश प्रद हैं हृदयतल से बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 8, 2014 at 9:23pm

आदरणीय अरुण भाई , मै, तुम , हम पर  आपकी दार्शनिक , आध्यात्मिक कुंडलिया बहुत बढिया लगी , आपको बहुत बधाइयाँ ॥

Comment by Abhinav Arun on January 8, 2014 at 5:25pm
क्या कहने आदरणीय श्री अरुण जी पुरे फार्म में हैं ....बहुत सुन्दर सशक्त समीचीन रचना ...विविध आयामों से परिपूर्ण विचारपरक रचना हार्दिक बधाई !!

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