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किसी सोच में कभी डूब के जो लिखा न हो औ कहा न हो

वो ग़ज़ल है क्या और वो गीत क्या किसी दिल को जिसने छुआ न हो

 

मेरी शाईरी में है जो निहाँ मेरे हर्फ़ में वो रवाँ रवाँ

मेरी है दुआ उसी रब से के कहूँ जब मैं कोई खफा न हो

 

ज़रा पूछिए किसी आदमी से छुआ है कैसे ये आसमाँ

क्या सफ़र में फर्श से अर्श के कोई है वो जो कि गिरा न हो

 

कहे माँ कहीं मिलें गर्दिशें तो खुदा दिखाता है रास्ता

इसी मोड़ पर मेरे वास्ते वो चराग ले के खडा न हो

 

हुआ “दीप” तू भी तो मतलबी बिना काम के तू भी कब मिला

कोई बात ऐसी करी नहीं छुपा जिसमें कोई नफा न हो

संदीप पटेल "दीप"

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 8, 2013 at 9:49am

आदरणीय विजय सर जी, आदरणीय अरुण भाई साहब, आदरणीय सूबे सिंह जी, आदरणीय राजेश सर जी .....आप सभी का ह्रदय से धन्यवाद स्नेह और मार्गदर्शन बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 8, 2013 at 9:47am

आदरणीय सम्पादक महोदय जी सादर प्रणाम

आप से निवेदन है की आप मेरी ग़ज़ल के मतले को इस प्रकार बदलने की कृपा करें

किसी सोच में कभी डूब के जो लिखा न हो व कहा न हो

वो ग़ज़ल है क्या कि  वो गीत क्या किसी दिल को जिसने छुआ न हो

सादर प्रार्थी /////

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 8, 2013 at 9:45am

आदरणीय सौरभ सर जी सादर प्रणाम

सत्य कहा आपने सर जी ........मैं संशय में था इसीलिए त्रुटी हुई है

आपके मार्गदर्शन के लिए ह्रदय से धन्यवाद स्नेह और आशीष यूँ ही बनाये रखिये

//लेकिन मेरे कहे से बेहतर आप सोच लेते हैं, यह मैं जानता हूँ.// आदरणीय ये सब आप अग्रजों का स्नेह और आशीर्वाद है फिर भी अभी इतनी कूबत नहीं है की आप से बेहतर सोच लूँ

स्नेह बनाये रखिये


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 7, 2013 at 11:27pm

मुझे मतले के सानी में और से परेशानी हुई है, भाईजी. और किसी सूरत में एक मात्रिक नहीं हो सकता. इसके लिए एक प्रचलित स्थानापन्न या ऑप्शन है. जो कि मतले के उला  का स्थान ले सकता है. लेकिन यही सानी में और के स्थान पर उचित नहीं लग रहा. उस जगह कि का प्रयोग शायद उचित हो.  लेकिन मेरे कहे से बेहतर आप सोच लेते हैं, यह मैं जानता हूँ.

अन्य अश’आर के लिए बस वाह वाह वाह ! 

शुभेच्छाएँ

Comment by सूबे सिंह सुजान on December 2, 2013 at 9:55pm

वाह..........क्या आपने तरह मुशायरे में जिसे प्रयुक्त किया वही ग़ज़ल यहां पोस्ट की है क्या।

Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 11:45am

जय हो, आदरणीय, बड़ी अच्‍छी लगी आपकी प्रस्‍तुति, सादर

Comment by vijay nikore on December 1, 2013 at 12:44pm

इस खूबसूरत गज़ल के लिए आपको बधाई, आदरणीय संदीप जी।

सादर,

विजय निकोर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 1, 2013 at 12:32pm

आदरणीय संदीप भाई साहब वाह बहुत शानदार तरही ग़ज़ल पेश की है आपने सुन्दर अशआर शानदार ग़ज़ल बहुत बहुत बधाई स्वीकारें

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 11:04am

आपका ह्रदय से आभार आदरणीया सरिता जी .........स्नेह यूँ ही बनाए रखिये

Comment by Sarita Bhatia on December 1, 2013 at 11:04am

बेहतरीन गजल संदीप जी वाह ,हार्दिक बधाई 

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