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घर से निकली तो वो अखबार में आ जाती है

बात सच जो लबे खुद्दार में आ जाती है

मैं ये सोचे हूँ क्यूँ बेकार में आ जाती है

 

सारा दिन खेलती है साथ में बच्चों के जो  

उनके सोते ही वो बाज़ार में आ जाती है

 

हर दफा सुन के चुनावी औ सियासी बातें

याँ चमक सूरते बीमार में आ जाती है

 

गालियाँ भीड़ को दे यार से भी लड़ मर ले

कैसे हिम्मत किसी मैख्वार में आ जाती है

 

रोते चेहरों को हँसाना ही जिन्हें है भाता  

रूह उन जैसी भी संसार में आ जाती है

 

बात घर की तो रहे घर में ही अच्छा होगा

घर से निकली तो वो अखबार में आ जाती है

 

“दीप” मुस्कान लिए लब पे हमेशा जलना

ऐसे जलने की अदा प्यार में आ जाती है

.............दीप...............

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 30, 2013 at 6:34pm

आदरणीय नीलेश जी ,आदरणीय डॉ प्राची जी .......उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय से आभार स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 30, 2013 at 6:33pm

आदरणीय विजय मिश्र जी, आदरणीया महिमा श्री जी उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 30, 2013 at 6:33pm

आदरणीय नादिर खान सर जी , आदरणीय बृजेश सर जी .......उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 30, 2013 at 6:32pm

आदरणीय अखिलेश सर, आदरणीय गिरिराज सर जी सरहना के लिए सादर आभार स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 30, 2013 at 6:31pm

आदरणीय सुनील जी ......आदरणीय सारथि जी आपका ह्रदय से आभार स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 30, 2013 at 6:30pm

आदरणीय गोपाल सर जी सराहना के लिए सादर आभार

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 29, 2013 at 9:43am

सारा दिन खेलती है साथ में बच्चों के जो  

उनके सोते ही वो बाज़ार में आ जाती है

बात घर की तो रहे घर में ही अच्छा होगा

घर से निकली तो वो अखबार मे आ जाती है 

बहुत सुन्दर शेर हुए हैं 

हार्दिक बधाई संदीप जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 29, 2013 at 9:22am

सारा दिन खेलती है साथ में बच्चों के जो  

उनके सोते ही वो बाज़ार में आ जाती है 

 

बात घर की तो रहे घर में ही अच्छा होगा

घर से निकली तो वो अखबार में आ जाती है .......बहुत ख़ूब ...बधाई 

Comment by MAHIMA SHREE on November 27, 2013 at 8:14pm

रोते चेहरों को हँसाना ही जिन्हें है भाता  

रूह उन जैसी भी संसार में आ जाती है

 

बात घर की तो रहे घर में ही अच्छा होगा

घर से निकली तो वो अखबार में आ जाती है....... वाह एक से बढ़ कर एक बेहतरीन शेर ... बहुत -२ बधाई आदरणीय संदीप जी

Comment by विजय मिश्र on November 27, 2013 at 4:52pm
"रोते चेहरों को हँसाना ही जिन्हें है भाता
रूह उन जैसी भी संसार में आ जाती है |-- बहुत शकून मिला पढकर , एक बेहद संजीदा गजल , संदीपजी , बधाई .

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