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सियासत का गिद्ध

जम्हूरियत के बुर्ज पर

बैठा सियासत का गिद्ध

फेरता है चारो ओर

पैनी निगाह

जो है अप्रेरित

भूख से,

वह ढूंढता नहीं है

लाश,

भिड़ाता है तरकीब

लाश  बिछाने की..

सत्ता की अंध महत्वकांक्षा में

ये निगाह रहती है

चिर अतृप्त.

चुनावों के मौसम में बढ़ जाती

आवाजाही गिद्धों की .

.......... नीरज कुमार ‘नीर’

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 450

Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 26, 2013 at 2:22pm

आदरणीय नीरज जी ..बेहतरीन तरीके से करारी बात ..सादर 

Comment by Neeraj Neer on November 25, 2013 at 7:35pm

आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 25, 2013 at 10:23am
आदरणीय नीरज भाई, वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति पर बहुत करारा व्यंग !!! आदरणीय आपको हृदय से बधाई !!!
Comment by Neeraj Neer on November 25, 2013 at 8:52am

आदरणीय शिज्जू साहब आभार ..

Comment by Neeraj Neer on November 25, 2013 at 8:51am

जीतेन्द्र गीत साहब हार्दिक आभार ..

Comment by Neeraj Neer on November 25, 2013 at 8:51am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहब .. आभार आपका ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 25, 2013 at 7:45am

आदरणीय नीरज 'नीर' जी इस खूबसूरत रचना के लिये आपको बहुत बहुत बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 25, 2013 at 12:46am

सच! सियासती गिद्धों के स्वार्थ से सिर्फ लाशें बिछकर रह जाती है, सार्थक रचना पर बधाई स्वीकारें आदरणीय नीरज जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 24, 2013 at 7:08pm

नीरज जी

बड़ी गिद्ध  सिद्ध कविता है

गिद्ध  तो केवल लाश खाते है

उनका भोजन है 

पर ये सियासती गिद्ध

लाश बिछाते है वोटो के लिए --------

 

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