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मेरी चाहतें यूँ निखार दे, मेरी शाम कोई सँवार दे- शिज्जु

11212- 11212- 11212- 11212

 

मेरी चाहतें यूँ निखार दे, मेरी शाम कोई सँवार दे

सरे बाम चाँदनी है खिली, मेरे दिल पे कोई उतार दे

 

करे रौशनी इन अँधेरो मे, ये चिराग यूँ जले उम्र भर

वो ज़िया सा ताब दे ऐ खुदा, उसे चाँद सा तू वक़ार दे

 

उसे देखता हूँ चमन-चमन, कि रविश-रविश मैं करूँ कियाम

कभी खुश्बुएँ वो बिखेर दे, मुझे शबनमी सी फुहार दे

 

वो खुली ज़मीन खिला चमन, वो हवा, महकती हुई फ़िज़ा

वही साअतें करे फिर अता, मुझे फिर खुदा वो बहार दे 

 

ये नया-नया सा लगे है तर्जे सितमगरी मेरे दोस्तो

कि वो बेखबर मुझे ज़िन्दगी के लिये दुआ सरे-दार दे

 

ये उदासियाँ तो नसीब है, कभी इनसे तू न गुरेज कर

इन उदासियों को समेट ले, शबे बेकराँ यूँ गुज़ार दे

 

 

साअतें= पल, क्षण, ज़िया= सूर्य का प्रकाश, वक़ार= प्रतिष्ठा

सरे-दार= सूली पर, बेकराँ= असीम, रविश= बाग के अंदर की पगडंडी

 

-मौलिक व अप्रकाशित

 

 

 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 18, 2013 at 8:45am

बहुत ख़ूब ... हर एक शेर एक मोती जैसा है ...
बशीर 'बद्र' साहब वाला अंदाज़ ... वाह क्या कहने ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by Abhinav Arun on November 18, 2013 at 7:01am

वाह श्री शिज्जू जी , निखरी हुई ख़ूबसूरत ग़ज़ल , हर शेर ग़ज़ल के निकष पर खरा खरा ...दिल को एहसास की वादियों में ले जाने में सक्षम ...इस समग्र प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई दिल से आपको , बहुत शुभकामनायें भी !!

Comment by वीनस केसरी on November 18, 2013 at 3:18am

ये नया-नया सा लगे है तर्जे सितमगरी मेरे दोस्तो

कि वो बेखबर मुझे ज़िन्दगी के लिये दुआ सरे-दार दे

 

ये उदासियाँ तो नसीब है, कभी इनसे तू न गुरेज कर

इन उदासियों को समेट ले, शबे बेकराँ यूँ गुज़ार दे

जिंदाबाद भाई जिंदाबाद

दिल खुश हो गया ...

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 18, 2013 at 12:14am

किसी एक द्विपदी को उद्धृत करना अन्य सब के साथ न्यायपूर्ण नहीं होगा। समग्रत: एक उत्कृष्ट रचना हेत हार्दिक बधाई। उर्दू का सहज प्रयोग गजलियत को निखार रहा है। सादर।

Comment by वेदिका on November 18, 2013 at 12:00am

वाह! खिली खिली सी गज़ल लिखी है आ0 शिज्जु जी! पढ़ के मन खुश हो गया| 

वो खुली ज़मीन खिला चमन, वो हवा, महकती हुई फ़िज़ा

वही साअतें करे फिर अता, मुझे फिर खुदा वो बहार दे,,, वाह वाह!

दाद लीजिये! 

 

Comment by Ayub Khan "BismiL" on November 17, 2013 at 8:41pm

bahut khoob bahut Umdaaa ..............Behtreen AshaaR Se Nawaza hai Janaab 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 17, 2013 at 8:36pm

आदरणीय शिज्जू भाई , वाह वाह !!! लाजवाब , बेमिसाल गज़ल के लिये आपको तहे दिल से बधाई !!!!!

करे रौशनी इन अँधेरो मे, ये चिराग यूँ जले उम्र भर

वो ज़िया सा ताब दे ऐ खुदा, उसे चाँद सा तू वक़ार दे

 

उसे देखता हूँ चमन-चमन, कि रविश-रविश मैं करूँ कियाम

कभी खुश्बुएँ वो बिखेर दे, मुझे शबनमी सी फुहार दे

 

वो खुली ज़मीन खिला चमन, वो हवा, महकती हुई फ़िज़ा

वही साअतें करे फिर अता, मुझे फिर खुदा वो बहार दे  ---------------- इन  तीनो शे र  के लिये जितनी दाद दूँ , कम है !!!!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 17, 2013 at 6:45pm

जय हो आदरणीय वाह वाह वाह

इक इक अशआर ग़ज़ब ढा रहा है

वाह वाह वाह

हर इक अशआर पर ढेरों दाद ..................इस ग़ज़ल को गुनगुना के मजा आ गया

इस शानदार ग़ज़ल के लिए दिली दाद हाजिर है सादर

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