For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मेघ भी है, आस भी है और आकुल प्यास भी है,

पर बुझा दे जो हृदय की  आग वह पानी कहाँ है ?

 

स्वाति जल की  कामना में, 'पी कहाँ?' का मंत्र पढ़कर 

बादलो  को जो रुला दे, मीत !  वह मानी कहाँ है ?

 

क्षत-विक्षत  है  उर धरा का, रस रसातल में समाया,

सत्व सारा जो लुटा दे,  अभ्र वह  दानी कहाँ है ?

 

पार नभ के लोक में, जो बादलो पर राज करता,

छल-पराक्रम का धनी वह इंद्र अभिमानी कहाँ है ?

 

मौन  पादप, वृक्ष नीरव, वायु चंचल,  प्राण व्याकुल

इन्द्रधनुषी इस रसा का रंग वह धानी कहाँ है ? 

 

सृष्टि  भीगे, रूप सरसे, जिस सुहृद से नेह बरसे,  

उस पिघलते मेह जैसे वीर का सानी कहाँ है ?  

 

कुछ  सरस है,  कुछ विरस भी, तृप्त कोई, दृप्त कोई 

नियति जल कि थाह लेता जीव अज्ञानी कहाँ है  ?

 

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

Views: 1011

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 18, 2013 at 3:31pm

गोपाल भाई इतनी खूबसूरत भावपूर्ण कविता की हार्दिक बधाई ॥


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 18, 2013 at 11:47am

बहुत सुन्दर भाव प्रवण कविता 

हार्दिक बधाई डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी 

Comment by Neeraj Nishchal on November 14, 2013 at 7:29pm

कुछ सरस है, कुछ विरस भी, तृप्त कोई, दृप्त कोई

नियति जल कि थाह लेता जीव अज्ञानी कहाँ है ?

ऐसी कविता तो वही लिखता है जो ऋषि भी हो और कवि भी हो
बहुत ही खूबसूरत बहुत ही सुन्दर ।

Comment by Sushil.Joshi on November 14, 2013 at 5:08am

बेहद खूबसूरत एवं ह्रदय को अंदर तक भेदती इस सुंदर प्रस्तुति हेतु बहुत बहुत बधाई आ0 गोपाल जी....

Comment by बृजेश नीरज on November 13, 2013 at 11:54pm

बहुत सुन्दर, मन्त्र मुग्ध करती रचना! आपको हार्दिक बधाई!

इसे आपने कविता क्यों कहा, गीत या ग़ज़ल क्यों नहीं, ये समझ नहीं आया!

Comment by Meena Pathak on November 13, 2013 at 5:13pm

बहुत सुन्दर, बधाई | सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 13, 2013 at 5:01pm

वाह वाह वाह आदरणीय हृदयस्पर्शी रचना शिल्प, कथ्य, प्रवाह देखते ही बनता है पढ़कर मन मुग्ध हो गया ह्रदय आनंदित हो उठा बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2013 at 12:25pm

आदरणीय गोपाल जी ...आपकी यह रचना पाठक को अपने साथ बहाने में सक्षम है ..पहली से अंतिम पंक्ति तक आनंदित करने वाले रचना ...आदरणीय सौरभ सर के बिचारो में भी मैं सहमत हूँ..सादर बधाई के साथ 

Comment by vijay nikore on November 13, 2013 at 4:50am

भावभीनी रचना। इस उत्कृष्ट कविता के लिए सराहना और बधाई, आदरणीय गोपल नारायन जी।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 12, 2013 at 10:31pm

प्रस्तुति को गीत कहूँ कि ग़ज़ल कहूँ ! .. बस मुग्ध हूँ.


प्रस्तुति के प्रवाह में बहता गया, आदरणीय. गीत के भाव में देखूँ तो हृदय की तृषा को संतृप्तकारी बहाव रससिक्त करता है. हृदय की आकुलता को जितने आयाम मिले हैं, वे सभी सर्वसमाही हैं.

इन्द्र के प्रति ललकार यों चकित कर गया. किन्तु, इस बंद की आवश्यकता नहीं बन पारही है मेरी समझ में. ऐसा लगा मुझे.

मौन पादप, वृक्ष नीरव, वायु चंचल, प्राण व्याकुल
इन्द्रधनुषी इस रसा का रंग वह धानी कहाँ है ? ...  .... वाह वाह ! संभाव्य का सुन्दर चित्रण हुआ है !

अन्यान्य बंद प्रभावशाली तो हैं ही, विधा से समर्थ और कारण से सार्थक भी हैं.
 
अब, यदि ग़ज़ल के लिहाज से देखूँ तो ग़ैर मतला की ग़ज़ल चौंक जाने कारण नहीं हुआ करती. बस आखिरी शेर के सानी में नियति शब्द को बाँधने में दिक्कत हो रही है. मैं चाह कर भी नियत  शब्द को २ १ में नहीं बाँध पाऊँगा. इसे १ २ का वज़्न ही मिलेगा.

इस सुन्दर रचना के लिए हृदय से बधाई स्वीकारें आदरणीय.
सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service