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मेरा प्रश्‍न ---अखंड गहमरी की प्रस्‍तुति

वक्‍त की मारी नहीं मैं,

हालत की मारी नहीं मैं,

जिन्‍दगी से घबराई नहीं मैं

शिकार हूँ दुश्‍कर्म की ,

जि‍न्‍दगी से हारी नहीं मैं।

अवला नहीं मैं 

जो सहूँ जुल्‍मो सितम केा

आज की नारी हूँ,

बदल दूँगी जमाने को,

जमाने की सोच केा

अपनी जिंन्‍दगी केा

क्‍योंकि मैं आज की नारी हूँ

जिन्‍दगी से हारी नहीं हूँ।

मेरा क्‍या हुआ,

सम्‍मान गया

नहीं।

बेनकाब हो गया

चेहरा मानव समाज का

सल्‍तनत का

धर्म के ठीकेदारो का

जो करते है दावे

अबलाओं की इज्‍जत का

मान का,

प्रतिष्‍ठा का

कहाँ गये उनके दावे

जब लुट रही थी सरे राह

अबला की इज्‍जत

हो रहा था खेलवाड

उसकी अस्मिता से,

आज मेरा प्रश्‍न है

समाज के ठीकेदारो से

पुलि‍स के जवानो से

सरकार के नुमांइदो से

मेरा सवाल हैं

मानव समाज से,  

आखि‍र कब तक

लुटेगी हमारी इज्‍जत

कब होगें हम सुरक्षि‍त

कब होगी अबला

के अस्मिता की रक्षा

आज की बेटी

फाँसी की सजा नहीं

सुरक्षा के वादे नहीं

सुरक्षा चाहती हैं

ताकी फि‍र ना हो

कोई बेटी अखंड

शि‍कार बलत्‍कार का

जोरो- जर्बदस्‍ती का

अनचाहे संबंधों का

ना हो डर उसे

मर्यादा खोने का

ना हो उसे डर

सुरक्षा का 

एक बेटी चल सके 

निर्भय होके इस यकीन से

इस विश्‍वास से कि

आज

उसके साथ है

आप,हम 

और पूरा मानव समाज

मौलिक एंव अप्रकाशित अखंड गहमरी

 

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Comment

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Comment by Sushil.Joshi on November 14, 2013 at 4:58am

भावों का सुंदर संप्रेषण है आ0 अखंड गहमरी जी...... बहुत बहुत बधाई....... किंतु वही टंकण त्रुटियाँ हैं..... आपको उन्हें सुधारने पर गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है...

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 13, 2013 at 4:32pm

आदरणीय प्रयास बहुत बढ़िया विचार बेहद नेक हैं बधाई स्वीकारें

Comment by ram shiromani pathak on November 13, 2013 at 12:48am

इस  तरह  कि  रचना  पहली  बार  पढ़  रहा  हूँ  भाई  जी....... अच्छी सोच है.......   


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 12, 2013 at 5:42pm

आदरणीय अखंड गहमरी जी, बहुत अच्छी प्रस्तुति है बधाई स्वीकार करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 12, 2013 at 2:02pm

आदरणीय अखंड भाई , बहुत अच्छी रचना के लिये बधाई !!!!!

Comment by वेदिका on November 12, 2013 at 1:40pm

बढ़िया कथ्य है प्रस्तुति का|

प्रयास पर बधाई लीजिये!!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 12, 2013 at 12:23pm

 गहमरी जी  शुरूआती  हडबडी के बाद  जब आप जमे  तो क्या बैटिंग की  I टाइप की  त्रुटियाँ चुभती हैं  I

 

समाज सुधरे या न सुधरे   पर कवि धर्म बना रहे   यही हमारा कर्त्तव्य है  I

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