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लघुकथा : मतिमूढ़ (गणेश जी बागी)

संता लगभग एक साल बाद अपने गाँव लौट रहा था । बसंता इतना खुश था कि जो भी वेंडर ट्रेन मे आता वो कुछ न कुछ खरीद लेता, माला, गुड़िया, चूड़ी, बिंदी, सोनपापड़ी और भी बहुत कुछ । पैसे देने के लिए हर बार वह नोटों से भरा पर्स खोल लेता । अगल बगल के यात्रियों ने उसे डांटा भी, मगर भोला भला बसंता हँस कर बात टाल जाता ।    

आख़िर वही हुआ जिसका डर था, चलती ट्रेन में किसी ने उसका रुपयों से भरा पर्स निकाल लिया । बसंता ज़ोर ज़ोर से रोने लगा, तब सहयात्रिओं की आवाज़ें हर तरफ गूंजने लगीं । 

"देखा, इसीलिए मैं तुम्हें डाँट रहा था, और खोलो सब के सामने पर्स, करवा लिया न हजारों रुपयों का नुक्सान !
"मैं रुपयों के लिए नहीं रो रहा हूँ बाबू जी, पर्स में मेरी स्वर्गवासी माँ की फोटो थी, मेरे पास उसकी और कोई फ़ोटो भी नहीं है" 
तभी किसी की आवाज़ आई "मतिमूढ़ कही का ....."

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट => लघुकथा : डंक

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Comment by मिथिलेश वामनकर on February 12, 2015 at 2:09am

भोला भला बसंता.... भोला भाला बसंता

ऐसी मतिमूढ़ता  सबको मिले 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 16, 2013 at 11:00am

प्रतिक्रिया हेतु आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 16, 2013 at 10:59am

प्रिय अतेन्द्र जी, आपकी टिप्प्णी इस लघुकथा को विस्तारित करती है, इस प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत आभार । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 16, 2013 at 10:58am

//क्या कीमत है भावनाओं की ? बस मतिमूढ़ता ही बचाये रखती है सम्बन्ध//
आदरणीय सौरभ भइया, आपके कहे से बिलकुल सहमत हूँ, बहुत बहुत आभार आपका । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 16, 2013 at 10:23am

आदरणीय अखिलेश कृष्ण भाई साहब, जब आप जैसे लेखकों से उत्साहवर्धन टिप्प्णियां मिलती हैं तो ह्रदय प्रफुल्लित हो जाता है, बहुत बहुत आभार, स्नेह बना रहे । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 16, 2013 at 10:21am

आदरणीय अभिनव अरुण जी, उत्साहवर्धन करती टिप्प्णी हेतु दिल से धन्यवाद प्रेषित करता हूँ । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 16, 2013 at 10:20am

आदरणीय राजेश कुमारी जी, आपको लघुकथा पसंद आयी, लेखन कर्म सार्थक हुआ,आभार आपका । 

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 5:33am

आज जब पैसों की अहमियत रिश्तों पर भारी पड़ती दिख रही है, ऐसे में इस प्रकार की कथाएँ निश्चित रूप से हमें रिश्तों की अहमियतता को बताने में सक्षम हैं...... सुंदर एवं सार्थक इस लघु कथा हेतु बधाई आ0 गणेश भाई....

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 7, 2013 at 2:52pm

Not matuimudh Basanta is an innocent misfortunist ie abodh abhagga

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on November 6, 2013 at 7:24pm

प्रणाम सर जी ...वैसे देखा जय तो इस युग में माँ की अहमियत कुछ कम सी हो गई है पैसे और पत्नी के आगे ऐसे में कोई माँ कि फोटो पर्स में रक्खे या सीने से लगाए आचम्भित करता जरुर है .....अगर इक्कीसवीं सदी का समाज पैसे को तथा उन्नीसवी सदी का समाज माँ को अहमियत देता है तो कौन सा समाज अच्छा है ....उन्नीसवीं शताब्दी जैसी सोच रखने वाला  भोला भाला हो सकता है पर मतिमूढ़ कैसे हो सकता है ..वह तो आज के लोग जो खुद को चतुर समझते हैं कहीं उनसे अधिक बुद्धिमान है ...चतुर सुजानों की नज़र में  वो मतिमूढ़ ही कहलायेगा जिनके लिए पैसा ही सब कुछ  है ...अच्छी लघु कथा के लिए बधाई आपको सर जी

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