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दोहा

बज रही बड़ी जोर की, चुनावी शंखनाद ।

निंद उड़े जहां उनकी , तुम दिल रख लो हाथ ।।

सोरठा

लोकतंत्र पर्व एक, उत्सव मनाओं सब मिल ।

बढ़े देश का मान, कुछ ऐसा करें हम मिल ।।

ललित

वोट का चोट करें गंभीर, अपनी शक्ति दिखाओं ।

जो करता हो देश हित काज, उनको तुम जीताओं ।।

गीतिका

देश के मतदाता सुनो, आ रहा चुनाव अभी ।

तुम करना जरूर मतदान, लोकतंत्र बचे तभी ।।

राजनेता भ्रश्ट हों जो, मुॅह बंद उनका करें ।

लालच चाहे जितना दें, लोभ में न कभी पड़े ।।

....................................................

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by विजय मिश्र on October 25, 2013 at 1:00pm
एक सुंदर सन्देश ,मार्ग दर्शन , जागरण ,सबकुछ समझाने की चेष्टा कियी आपने .हार्दिक धन्यवाद रमेशजी
Comment by Sushil.Joshi on October 25, 2013 at 5:01am

इस चुनावी परिपेक्ष्य में नए छंदों पर इस विषय का प्रयोग सुखकारी है.... बाकी विद्वजनों ने टिप्पणी में जो कहा है उसमें मेरी भी सहमति है.... आप प्रयासरत रहें......यह निश्चित रूप से आपकी लेखनी को संबल देगा...... लेकिन जल्दबाज़ी से बचें...... कृपया पोस्ट करने से पहले रचना को एक पाठक की दृष्टि से जाँच लें तो शायद त्रुटियों को सुधारा जा सकता है..... बधाई इस अनुपम प्रयास हेतु...

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 24, 2013 at 10:43pm

आदरणीय रमेश भाई जी नित नए छंद पर आपको प्रयास करते देख प्रसन्नता होती है यह प्रयास भी बहुत अच्छा है कंटक त्रुटियों पर ध्यान दें . प्रयास हेतु बहुत बहुत बधाई स्वीकारें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 24, 2013 at 6:06pm

आदरणीय रमेश भाई , चुनावी छंद के गम्भीर प्रयास के लिये आपको बधाई !!!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 24, 2013 at 2:26pm

आपकी कोशिशों के लिए धन्यवाद, आदरणीय रमेशजी.

आप छंदों पर हाथ आजमाते हैं यह सुखकारी है.  किन्तु, उससे पहले आप आधारभूत तैयारियाँ तो कर लें. प्रस्तुतियों में अक्षरी दोष व्याकरण दोष आदि का होना कई सुधीजनों को पढ़ने से उचटा देगा.

छंदों का वैधानिक मूल जानना उसके बाद की बातें होती हैं, जिनपर आगे बातें होंगीं.

शुभेच्छाएँ.

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