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ग़ज़ल - सितम सारे सहें कुछ यूँ

1222. 1222

चलो चल कर कहें कुछ यूँ
सितम सारे सहें कुछ यूँ

रियावत ओढ़ लें थोड़ा
जुदाई को सहें कुछ यूँ

सफीना कागजों का था
लहर से हम कहें कुछ यूँ

नशेमन नम न हो कोई
नयन अपने बहें कुछ यूँ

सितारें खोज लें हमको
अँधेरों में रहें कुछ यूँ

रियावत - परंपरा
सफीना - नाव
नशेमन - घोंसला

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on September 23, 2013 at 10:21am

नशेमन नम न हो कोई
नयन अपने बहें कुछ यूँ !

वाह बढ़िया ग़ज़ल पूनम जी !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 23, 2013 at 10:08am

अन्धेरा और अँधेरा एक अर्थ को निरुपित करते दो अलग-अलग शब्द हैं.

इस ग़ज़ल में अँधेरों का सही वज़्न हुआ है.

दाद कुबूल फ़रमायें पूनमजी.. .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 23, 2013 at 9:24am

पूनम जी ग़ज़ल अच्छी है,दाद कुबूल करें,

एक बार "रियावत" शब्द को लेकर आश्वस्त हो लें यह उर्दू का है या हिन्दी का??

Comment by saalim sheikh on September 23, 2013 at 2:45am
Giriraj ji, Munawwar sahab ke is sher mr 'andheron' ka wazan dekhen
Aye andhere dekh le munh tera kala ho gaya
maa ne ankhen khol din ghar me ujala ho gaya
2122 2122 2122 212
2122 2122 2122 212
Comment by saalim sheikh on September 23, 2013 at 2:30am
Adarniya Poonam ji Behad khubsurat gazal ke liye bahut bahut badhai swikaren
Adarniy Giriraj ji 'andheron' ka sahi wazan(urdu talaffuz ke mutabiq) mere khyal mein 122 hi hona chahiye
Comment by Saarthi Baidyanath on September 22, 2013 at 8:23pm

महोदया ..ग़ज़ल का मतला कमाल का लगा ...! अशआर भी खूब हुए हैं !...दाद हाज़िर है ..! नमन सहित :)

Comment by Monnmani Antaryami on September 22, 2013 at 6:24pm

bahut achha hai..subhan allah Poonam ji....mubarak baad....

Comment by Abhinav Arun on September 22, 2013 at 2:17pm

हर शेर लाजवाब आदरणीया पूनम बहुत खूब ग़ज़ल कही है --

सितारें खोज लें हमको
अँधेरों में रहें कुछ यूँ

बहुत बधाई और शुभकामनायें 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 22, 2013 at 1:23pm

रियावत ओढ़ लें थोड़ा
जुदाई को सहें कुछ यूँ.........यह शेर बहुत पसंद आया

सुंदर गजल पर , बधाई स्वीकारें आदरणीया पूनम जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 22, 2013 at 11:46am

आदरणीया पूनम जी , बहुत शानदार ग़ज़ल  कही है आपने , वाह !! ढ़ेरों बधाइयाँ !!

नशेमन नम न हो कोई
नयन अपने बहें कुछ यूँ ------------ क्या बात है !!

बस , अँधेरों  मे शंका है , अन्धेरों ( 222 ) को अँधेरों (122 ) किया जा सकता है कि नही !!

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