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लघुकथा : त्रिया चरित्र (गणेश जी बागी)

ये साहब बहुत ही कड़क और अत्यंत नियमपसंद स्वाभाव के थे ।  कई दिन रेखा देवी की हाजिरी कट गई |  फटकार लगी सो अलग ।

उस दिन साहब के चैम्बर से तेज आवाज़ें आ रही थीं । रेखा देवी चीखे जा रही थीं, "ये साहब मेरी इज़्ज़त पर हाथ डाल रहा है.."
सब देख रहे थे, ब्लाउज फटा हुआ था । साहब भी भौचक थे । उनकी साहबगिरी और बोलती दोनो बंद थी |


साहब संयत हुए और बोले, "जाओ रेखा देवी.. जब आना हो कार्यालय आना और जब जाना हो जाना, आज से मैं तुम्हें कुछ नही कहनेवाला । वेतन भी पहले जैसा समय से मिलता रहेगा ।.."
मामला सुलझ गया था । रेखा देवी जीत के भाव के साथ चैम्बर से बाहर निकल रही थीं |

(मौलिक व अप्रकाशित)

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:49am

आदरणीया अन्नपूर्णा बाजपेयी जी उत्साहवर्धन करती टिप्पणी हेतु बहुत बहुत आभार ।  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:48am

आदरणीया शुभ्रा शर्मा जी, सराहना एवं उत्साहवर्धन हेतु बहुत बहुत आभार । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:26am

लघुकथा को सराहने हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय राजेश कुमार झा जी, मुझे यह शीर्षक उचित लगा था, अन्य सदस्यगण भी स्वीकार किये हैं । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:23am

बहुत बहुत आभार आदरणीय केवल प्रसाद जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:20am

सराहना हेतु अतिशय आभार आदरणीय जीतेन्द्र जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:19am

बहुत बहुत आभार आदरणीया राजेश जी, लघुकथा आप तक पहुँच सकी लेखन कर्म सार्थक हुआ । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:18am

प्रिय वीनस भाई, प्रतिक्रिया हेतु आभार ।  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2013 at 11:14am

आदरणीय दीपक भाई साहब, सराहना हेतु आभार । 

Comment by mrs manjari pandey on September 3, 2013 at 9:35pm

         

        आदरणीय बागी जी बहुत सामयिक परिस्तिथि रखी आपने !ऐसी त्रियाओं से ही विश्वास दरकने लगा है  !

Comment by Shubhranshu Pandey on September 3, 2013 at 6:56pm

त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम्, दैवो न जानति कुतो मनुष्यः !

इस श्लोक का अर्थ एक बच्चे ने कुछ इस तरह किया था...औरतों का चरित्र और पुरुष का भाग्य देव भी नहीं जान सकता है, मनुष्य तो कुत्ता है.......हा...हा..हा...

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