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"क्या ये खबर सही है कि एकाध दिन में दंगे शुरू होने वाले हैं ?"
"बिलकुल सही सुना भाई, खबर एकदम पक्की है." 
"तो फिर क्या प्रोग्राम बनाया ?"
"सोच रहा हूँ कि इस दफा उनकी पार्टी में शामिल हो जाऊं."

"अबे तेरा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया ? बेगानों का साथ देकर अपनों से गद्दारी करेगा? 
"वो साले बेगाने ज़रूर हैं, लेकिन दिहाड़ी भी तो डबल देते हैं."

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Comment by shubhra sharma on August 26, 2013 at 7:19pm

आदरणीय योगराज सर , पैसे के लिए किसी के भी हाथ का खिलौना बन लोग समाज ,देश  को नुकसान करने में नही चुक रहे है , इस लघु कथा के द्वारा  बहुत सही इंगित की है आपने , बधाई स्वीकार करे  


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Comment by गिरिराज भंडारी on August 26, 2013 at 5:41pm

लाजवाब !!!! आदरणीय  योगराज जी !! आज के समाज का नंगा सच यही है , गलती किसकी है ये बहस का विषय है , पर सच तो यही है कि अब पैसा ही इमान है धर्म है !!

Comment by Sonam Saini on August 26, 2013 at 2:31pm

बढ़िया लघु कथा आदरणीय योगराज सर जी।

Comment by वेदिका on August 26, 2013 at 1:10pm

चाहे असंवेदना साबित हो या लालच,,, लेकिन एक संदेश शाश्वत है "भूख का धर्म केवल खाना है" 

बहुत बहुत बधाई आदरणीय योगराज जी! शानदार रचना के लिए !! 

Comment by annapurna bajpai on August 26, 2013 at 12:53pm

आदरणीय प्रभाकर जी आज के परिवेश को उजागर करती आपकी लघु कथा बहुत ही बढ़िया है , बधाई आपको । 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 26, 2013 at 12:47pm

आदरणीय वाह बेहद सुन्दर लघु कथा, वर्तमान में लोगों को सिर्फ पैसा ही नज़र आ रहा है उनके हिसाब से घर में पैसा आना चाहिए. चाहे तो अच्छे कामों से आये या गलत, जान भी जोखिम में डालनी पड़ जाये तो पड़ जाये किन्तु पैसा हो आना ही चाहिए. आदरणीय दिल से ढेरों बधाई स्वीकारें बड़ी गहरी बात कह दी आपने लघु कथा के जरिये.


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Comment by rajesh kumari on August 26, 2013 at 11:06am

पेट के लिए ईमान धर्म बेच देते हैं सच पूछो तो इनका कोई दीन  धर्म मजहब होता ही नहीं असंवेदन शील होते हैं ये लोग जहां हड्डियां मिली कूद पड़ते हैं वहां चिंचोड़ने के लिए ,बहुत गहराई से कम शब्दों में चोट की इस मुद्दे पर आदरणीय योगराज जी बहुत बढ़िया लघु कथा लिखी हार्दिक बधाई 

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