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एक्वेरियम की मछलियाँ

कांच की दीवारों में
साँसों के स्पंदन
कसमसाती पूंछ
छटपटाते डैने
शो पीस सरीखा जीवन
रास न आयें इन्हें
थोपी हुई रंगीनियाँ
एक्वेरियम में कैद
सुन्दर देह वाली  
मछलियाँ
है नहीं तलछट से
छनती धूप
अब इनके लिए
अरसा हुआ
लहरों की
स्वर्णिम गोद में
 खेले हुए
 चट्टानों की ऒट से
आखेट लुकछिप कर किये
मूँगों के झुरमुट में मानों
कौंधती थी बिजलियाँ
एक्वेरियम में कैद
सुन्दर देह वाली  
मछलियाँ
सिकुड़ गया ज़िन्दगी का
जादुई कैनवास
कुलबुलाती फिर रहीं
लेती हुई उच्छ्वास
  चंद पत्थर, चंद कंचे
प्लास्टिक की घास
 बनावटी शैवाल
खुलती बंद होती सीपियाँ
एक्वेरियम में कैद
सुन्दर देह वाली  
मछलियाँ

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Vinita Shukla on June 10, 2013 at 2:24pm

बहुत बहुत धन्यवाद आपका सुमित.

Comment by Sumit Naithani on June 10, 2013 at 12:23pm

बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति ............

Comment by Vinita Shukla on June 9, 2013 at 1:03pm

समर्थन व सराहना हेतु आभार राजेश कुमारी जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 8, 2013 at 11:53pm

बहुत सुन्दर मछलियों पर विशेष रचना जो वाकई दिल को छू गई जब कभी कहीं भी या अपने एक्युरियम देखती थी तो भाव यही आते थे दिल में फिर रखना छोड़ दिया वही भाव इस प्रस्तुति में पढ़कर पुरानी यादे तजा हो गई सोचती हूँ हमें किसी भी जीव की आजादी छीनने का क्या हक है ?

Comment by Vinita Shukla on June 8, 2013 at 11:02pm

अनेकानेक धन्यवाद महिमा जी.

Comment by MAHIMA SHREE on June 8, 2013 at 10:51pm

आदरणीया बहुत ही मार्मिक चित्रण ..  बहुत -२ बधाई आपको

Comment by Vinita Shukla on June 8, 2013 at 10:46pm

समर्थन एवं सराहना हेतु धन्यवाद जवाहर जी.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 8, 2013 at 9:50pm

कभी राजा राधिका रमण प्रसाद (शायद) जी ने कहा था उपवन में फूल खिलते हैं वन में हँसते हैं!

आपने बहुत ही जोरदार तरीके से एक्वेरिअम की मछलियों की पीड़ा बयां की है। सादर विनीता जी!
Comment by Vinita Shukla on June 8, 2013 at 7:24pm

बहुत बहुत धन्यवाद राम शिरोमणि जी.

Comment by Vinita Shukla on June 8, 2013 at 7:23pm

हार्दिक धन्यवाद कुंती जी.

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