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ग़ज़ल - मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए !

ग़ज़ल -

ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकलने के लिए ,
आदमी मजबूर है खुद को बदलने के लिए ।

सिर्फ कहने के लिए अँगरेज़ भारत से गए ,
अब भी है अंग्रेजियत हमको मसलने के लिए ।

हाथ में आका के देकर नोट की सौ गड्डियां ,
आ गये संसद में कुछ बन्दर उछलने के लिए ।

गुम गयीं बापू तेरी मूल्यों की सारी टोपियाँ,
और लाठी रह गयी सच को कुचलने के लिए ।

नित गिरावट के बनाए जा रहे हैं कीर्तिमान 
सभ्यता की छातियों पर मूंग दलने के लिए ।

घर बुजुर्गों के बिना कितने वियाबां हो गए ,
अब नसीहत किस से पाएं हम संभलने के लिए ।

रात भर में फ़िक्र को उनकी न जाने क्या हुआ ,
सुब्ह हमसे आ मिले पाला बदलने के लिए ।

मुंगे मोती से भरे सागर में ऐसा क्या हुआ ?
मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए ।

आने वाली पीढ़ियों के नाम पौधे रोप दें ,
शुद्ध शीतल वायु तो हो साँस चलने के लिए ।

                                - अभिनव अरुण 
                                  [14052013]

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Comment by Abhinav Arun on May 31, 2013 at 3:37pm

बहुत आभार  श्री योगेन्द्र जी ! ग़ज़ल आपको पसंद आई लेखन सार्थक हुआ , स्नेह बना रहे यही कामना है !

Comment by Yogendra Singh on May 30, 2013 at 8:24pm

बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल ॥ 

हर एक शेर बहुत खूब है 

घर बुजुर्गों के बिना कितने वियाबां हो गए ,
अब नसीहत किस से पाएं हम संभलने के लिए ।

रात भर में फ़िक्र को उनकी न जाने क्या हुआ ,
सुब्ह हमसे आ मिले पाला बदलने के लिए ।

मुंगे मोती से भरे सागर में ऐसा क्या हुआ ?
मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए ।

अति सुंदर 

Comment by Abhinav Arun on May 28, 2013 at 1:27pm

आदरणीय श्री बागी जी भाव पसंद आये , बहुत बल मिला आभार आदरणीय !!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 28, 2013 at 9:10am

//मुंगे मोती से भरे सागर में ऐसा क्या हुआ ?
मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए ।//

इस जोरदार कहन पर वाह वाह, दाद देता हूँ । 

Comment by Abhinav Arun on May 24, 2013 at 4:57pm

बहुत आभार आदरणीय जवाहर जी !!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 23, 2013 at 5:54am

बहुत ही सुंदर गजल आज के सन्दर्भ में 

नित गिरावट के बनाए जा रहे हैं कीर्तिमान 
सभ्यता की छातियों पर मूंग दलने के लिए ।

हार्दिक बधाई!

Comment by Abhinav Arun on May 20, 2013 at 3:29pm

बहुत बहुत धन्यवाद श्री नीरज जी !!

Comment by Abhinav Arun on May 20, 2013 at 3:29pm

आदरणीय श्री अशोक जी ग़ज़ल के शेर आपको पसंद आये हार्दिक आभार आपका !!

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 20, 2013 at 8:12am

गुम गयीं बापू तेरी मूल्यों की सारी टोपियाँ,
और लाठी रह गयी सच को कुचलने के लिए..........नैतिकता के अवमूल्यन पर सुन्दर शेर कहा है.

सिर्फ कहने के लिए अँगरेज़ भारत से गए ,
अब भी है अंग्रेजियत हमको मसलने के लिए ।..........हकीकत को आइना दिखाता सुन्दर शेर. वाह!

आदरणीय अभिनव अरुण जी सदर बधाई स्वीकारें.

Comment by Neeraj Nishchal on May 19, 2013 at 4:14am
Bahut sundar

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