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मई महीने के दूसरे रविवार को 

"मातृ दिवस"

नाया जाता है

बस एक दिन.....
माँ का सम्मान किया जाता है
क्या माँ..........

वो इसी एक दिन....... 

के लिये होती है

बाकी के....

तीन सौ चौंसठ दिन

वो शायद 

चाकरी करती है....

अपने बच्चों की...

अपने पति की..

िःस्वार्थ भावना लिये

और देर रात...

दुबक जाती है...

घर के किस कोने में

और संचय करती है

बल...
आने वाले कल के लिये 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by aman kumar on June 14, 2013 at 11:39am

स्त्री विमर्श पर एक सार्थक प्रस्तुति !

Comment by Vindu Babu on May 27, 2013 at 7:45am
बहुत ही मार्मिक भावाभ्यक्ति की है बहन आपने।
माँ को अगर कोई शब्द परिभाषित कर सकता है तो वह केवल 'माँ..'है।
सादर
Comment by नादिर ख़ान on May 9, 2013 at 12:54pm

और देर रात...

दुबक जाती है...

घर के किस कोने में

और संचय करती है

बल...
आने वाले कल के लिये ...

माँ तो अनमोल रत्न है ।

 

Comment by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on May 8, 2013 at 10:48am

सुन्दर रचना

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 7, 2013 at 8:08pm

आदरणीया यशोदा जी,   सुन्दर और सटीक बात!  मां वह होती है जो अपने लिए कुछ नही चाहती और वह अपना सर्वस्व अपने बच्चो पर निछावर कर देती है। और... रात के अंधेरों की तरह निढाल किसी कोने में....कल के उज्ज्वल भविष्य के लिए ही बल संचयन हेतु सपने देखती है। मां को श्रध्दा सुमन!  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Usha Taneja on May 7, 2013 at 6:48pm

आदरणीय यशोदा दिग्विजय अग्रवाल जी, बहुत बढ़िया सवाल उठाया है आपने. पर इसका एक दूसरा पहलू भी है कि इस दिन हम एक दूसरे की माँ से भी मिल लेते हैं. वरना हमेशा तो अपनी ही पड़ी रहती है.

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on May 6, 2013 at 5:28pm

मां के सम्मोहक व्यक्तित्व से जुडे अनगिनत पहलुओं में से एक को छूती सराहनीय रचना.........!!!!

Comment by Shyam Narain Verma on May 6, 2013 at 4:10pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by यशोदा दिग्विजय अग्रवाल on May 6, 2013 at 3:13pm

आप सभी स्नेही मित्रों का हृदय से आभार

Comment by बसंत नेमा on May 6, 2013 at 2:53pm

माँ के लिये एक दिन नही एक साल नही एक जन्म नही बल्कि जन्म दर जन्म माँ का गुणगान करो तब भी कम है ....... बधाई हो 

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