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‘‘गजल‘‘
एक प्रयास के फलस्वरूप प्रस्तुत है।
वज्न......1222 1222 1222 1222

कुसुम को तोड़कर किसने, हसीनों को रिझाया है।
रूहानी जानकर उसने, मकानों को सजाया है।।1

जहां में और भी किस्से, सुनाया नाम पाया है।
चुराकर रात का काजल, सुनयनों को लगाया है।।2

चला है शाम से नश्तर, सितम भी खूब ढाया है।
वतन को छोड़ आफत में, बेगानों को छिपाया है।।3

यहां कातिल वहां मंजिल, बहानों से बुलाया है।
खुदा को भूल आया वो, सकीनों को रूलाया है।।4

बहा जो अश्क सावन में, कसक इंतजार छाया है।
समन्दर में लगा पावक, गुनों किसने बुझाया है।।5

के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2013 at 7:25pm

आदरणीय गणेश सर जी, सादर प्रणाम।  जी, आपने तो मेरी शंका ही दूर नहीं की बल्कि मेरी गजल को भी दिशा दी हे।  सर जी, आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2013 at 7:19pm

आदरणीय गुरूवर सौरभ सर जी, सादर प्रणाम।  जी सर, मैनें कोई प्रयोग नहीं किया।  बस, अच्छा करने के लिए गुनगुना कर ही लिखा है।    सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2013 at 7:16pm

आदरणीय गुरूवर सौरभ सर जी, सादर प्रणाम।  जी, मेरे समझ में अभी तक कि मैने सब एक लय में कह दिया।  अब आ0 गणेश जी  की बात से कुछ कुछ समझ में आ रहा है। मैं अभी काफिया और रदीफ में संशय कर जाता हूं।  इसी लिए जब आ0 योग राज सर जी ने कहा तो मैं फिर से गजल कक्षा में पृष्ठ एक पर समझने की कोशिश करने लगा।  और मैने निर्णय लिया कि आ0 वीनस जी से अवश्य पूंछूंगा कि मैं कहां गलत हूं।   इस विशेष संवाद के लिए आप लोगों का हार्दिक आभार।   सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 24, 2013 at 6:53pm

बहुत-बहुत धन्यवाद, भाई गणेशजी.

यह अवश्य है कि अब इस ग़ज़ल के मिसरे बह्र में हो गये. वैसे यह जानना आवश्यक होगा कि भाई केवल प्रसाद जी ने इस पूरी कवायद से समझा क्या.

केवलप्रसाद भाईजी, स्वध्याय की जगह सीधे प्रयोग करने में ही इतना विश्वास क्यों करते हैं ! यह अक्सर भाईजी की रचनाओं के साथ होता है. या वो रचनाएँ किसी छंद में हो या यह ग़ज़ल ही क्यों न हो.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 24, 2013 at 5:24pm

चला है शाम से नश्तर, सितम भी खूब ढाया है।
वतन को छोड़ आफत में, बेगानों को छिपाया है।।  मतला 

कुसुम को तोड़कर किसने, रिझाया है हसीनों को।
रूहानी जानकर उसने, मकानों को सजाया है।। शे'र 

जहां में और भी किस्से, सुनाया नाम  है पाया।
चुराकर रात का काजल, सुनयनों को लगाया है।। शे'र 

यहां कातिल वहां मंजिल, बुलाया है बहानों से।
खुदा को भूल आया वो, सकीनों को रूलाया है।। शे'र 

बहा जो अश्क सावन में, किसी का दिल जो है टूटा। 
समन्दर में लगा पावक, गुनों किसने बुझाया है।। शे'र (अंडर लाइन हिस्सा वजन को ध्यान में रखकर बदलना पड़ा)

अब देखिये रचना शायद ग़ज़ल शिल्प पर हो ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 24, 2013 at 4:29pm

आपकी प्रस्तुति में ग़ज़ल के लिहाज से जिस गलती की ओर आदरणीय योगराजभाई ने इशारा किया है क्या वह गलती पकड़ में आयी, भाई केवलप्रसादजी ?

शुभेच्छाएँ

Comment by Shyam Narain Verma on April 24, 2013 at 12:29pm

BAHOT KHOOB.........................

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2013 at 11:19am

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी,  सादर प्रणाम!  सर जी,  मैं अभी गजल सीख रहा हूं। यह मेरी दूसरी गजल है, कुछ बातें अभी संशयपूर्ण लगती हैं,  जिन्हे समझने की कोशिश कर रहा हूं।  इसी ओ0बी0ओ0 पर ही गजल की कक्षा से पढ़ रहा हूं। इस बार कुछ गुनगुना कर लिखने की कोशिश की है।  सर, गलतियों के लिए क्षमा चाहता हूं। मेरी इस गजल पर ध्यान देने के लिए आपका  हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 24, 2013 at 11:12am

केवल भाई जी सादर मैं भी आदरणीय श्री योगराज सर जी से पूर्णतया सहमत हूँ भाई जी ओ बी ओ पर आप काफी सक्रिय हैं तो अभी तक ग़ज़ल की कक्षा में प्रवेश क्यूँ नहीं. उम्मीद है आप जल्द ही ग़ज़ल की कक्षा में प्रवेश लेंगे और हम सभी को एक अच्छी ग़ज़ल पढवायेंगे. सादर


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on April 24, 2013 at 10:16am

भाई केवल प्रसाद जी, यदि आपकी यह रचना ग़ज़ल है तो फिर शेअर कहाँ है ?

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