For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कौन मजबूत? कौन कमजोर ?

इम्तिहान

एक दौर

चलता है जीवन भर !

सफलता

पाता है कोई

कभी थम जाये सफ़र !

कमजोर

का साथ

देना सीखा,

ज़रुरत

मदद की

उसे ही रहती .

सदा साथ

नर का

देती रही ,

साया बन

संग उसके

खड़ी है रही ,

परीक्षा की घडी

आये पुरुष की

नारी बन सहायक

सफलता दिलाती ,

मगर नारी

चले मंजिल की ओर

पीछे उसके दूर दूर तक

वीराना रहे ,

और अकेली

वह इम्तिहान में

सफलता पाती !

फिर कौन मजबूत?

कौन कमजोर ?

दुनिया क्यों समझ न पाती ?

(मौलिक व् अप्रकाशित)

शालिनी कौशिक


Views: 780

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 15, 2013 at 8:41pm

मगर नारी

चले मंजिल की ओर

पीछे उसके दूर दूर तक

वीराना रहे ,

और अकेली

वह इम्तिहान में

सफलता पाती !

फिर कौन मजबूत?

कौन कमजोर ?

दुनिया क्यों समझ न पाती ?

बहुत सही सवाल उठाए हैं.. 

एक औरत जब मंजिल की ओर बढती है तो उसका संघर्ष अकेला ही होता है.. 

क्योंकि उसकी जीत और हार से कोई और नहीं जुड़ा होता.. ये सफर सिर्फ उसका निर्णय होता है, अपनी ज़िंदगी में जो वो चाहती है , वो पाने के लिए.

समाज में सभी के साथ परिस्थितियाँ एक सी नहीं होती, फिर भी यह एक विशेष नारी समुदाय भली प्रकार महसूस करता है...

इस अभिव्यक्ति के लिए बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on April 15, 2013 at 7:44pm

आदरणीया शालिनी जी आपको इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई!

आप तो प्रबल हस्ताक्षरों में से एक हैं इसलिए आपकी रचना पर कुछ कहना उचित तो नहीं फिर भी इतना कहना चाहूंगा कि

//कमजोर

का साथ

देना सीखा,//

क्या पंक्ति को तोड़ना आवश्यक था?

दूसरी बात एक निवेदन करना चाहूंगा कि या तो कविता में विराम चिन्हों का प्रयोग किया जाना चाहिए अथवा पदो के बीच स्पेस दिया जाना चाहिए जिससे कविता के प्रवाह और बात की समाप्ति व प्रारम्भ को पाठक आसानी से समझ सके।

आशा है आप मेरे इस दुस्साहस को क्षमा करेंगी और मेरे कहे को अन्यथा न लेंगी।

सादर!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 15, 2013 at 4:40pm

नर का

देती रही ,

साया बन

संग उसके

खड़ी है रही ,

परीक्षा की घडी

आये पुरुष की

नारी बन सहायक

सफलता दिलाती ,

मगर नारी

चले मंजिल की ओर

पीछे उसके दूर दूर तक

वीराना रहे ,

और अकेली

वह इम्तिहान में

सफलता पाती !

फिर कौन मजबूत?

यक्ष प्रश्न है 

आदरणीया शालिनी जी 

सादर बधाई. 

Comment by ram shiromani pathak on April 15, 2013 at 3:13pm

 बहुत सुन्दर बधाई शालिनी  जी !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 15, 2013 at 2:23pm

आदरणीया शालिनी जी सादर
इस रचना के लिए बधाई किंतु

इन पंक्तियों से सहमत नहीं हूँ

मगर नारी
चले मंजिल की ओर
पीछे उसके दूर दूर तक
वीराना रहे ,
और अकेली
वह इम्तिहान में
सफलता पाती !

ये तो उस समय भी नही हुआ जिस समय नारियों को केवल घर मे ही रहना पड़ता था
हर समय उसके जीवन साथी ने उसका साथ निभाया होगा
नहीं तो वो सारी जिंदगी घुट घुट के कैसे जीती
कुछ एक को देख कर हम सभी को ऐसा तो नहीं कह सकते हैं
हाँ सहानुभूति रखना ठीक है पर नर पर आरोप लगाना के वो साथ नही देता ग़लत लगा
कदम कदम पर वो साथ देता है और सलाह मशविरा भी करता है
नहीं तो सारी नारियाँ एकाकी जीवन बिताते बिताते नीरस हो चुकीं होती
माता पिता उनकी शादी ही नहीं करते ..........आख़िर उनसे ज़्यादा कौन जान सकता है ये पीड़ा
सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 15, 2013 at 10:38am

इम्तिहान का दौर तो जीवन रूपी संघर्ष में सदैव ही चलता रहता है, उसको पार कर आआगे बढ़ते रहना होता है |

कमजोर कोई नहीं होता, मन में आत्म-विश्वास जगा सापेक्ष सोच प्रयत्नशैल रहने से और सभी से सहयोग हेतु 

तालमेल बिठाकर खास तौर से जीवेन साथी से, सफलते प्राप्त की जा सकती है | प्रस्तुति के लिए बधाई शालिनी कौशिक जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 15, 2013 at 10:19am

आ0 शालिनी कौशिक जी,  प्रणाम!   बहुत सुन्दर..! बधाई स्वीकार करें।  सादर,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
10 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
10 hours ago
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service