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हर तरफ खौफनाक सन्नाटा

कहीं कोई आवाज नहीं

हालांकि दर्द हदों को छू गया।

 

जिंदगी

दरकने लगी है

तप रही है जमीन,

पानी की बूंद

गायब हो जाती है

गिरते ही;

सिर झुकाए लेटी

भूरी घास की आंख में

प्यास छलकती है।

 

ओठों पर जमी

पपड़ियां रोकती हैं

शब्दों को बढ़ने से

हवा घूम फिर कर

लौट आती है वहीं

जर्जर किवाड़

हिलता है बस।

 

छप्पर के नीचे

सिर झुकाए बैठा

कुत्ता

रखवाली कर रहा है

जरूरतों की।

 

भूख

अहसास बन

पूरे मन पर छा गयी;

चूल्हों ने बंद कर दिया

शिकायत करना।

 

शरीर में जगह जगह

उभर आई हैं दरारें

जिन्हें चीथड़ों से भरने की कोशिश

नाकाम होने लगी हैं।

 

आंख में कोई सपना तो नहीं

लेकिन देखती हैं उस तरफ

जो सड़क संसद को जाती है

वह सड़क बंद है।

               - बृजेश नीरज

 

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Comment

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Comment by coontee mukerji on April 14, 2013 at 10:08am

इस रचना का कोई जवाब नहीं.आपकी लेखनी को मैं प्रणाम करती हूँ.सादर कुंती

Comment by vijay nikore on April 14, 2013 at 3:55am

बृजेश जी,

 

//भूख

अहसास बन

पूरे मन पर छा गयी;

चूल्हों ने बंद कर दिया

शिकायत करना।//

 

भावपूर्ण बिम्बों से भरपूर कविता के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on April 13, 2013 at 9:31pm

संदीप भाई आपका आभार! आपकी हौसला अफजाई है जो कुछ लिखने का साहस यहां कर पा रहा हूं।
सादर!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 13, 2013 at 9:25pm

आदरणीय बृजेश जी सादर 

बहुत ही सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिये सादर 

मार्मिक चित्रण किया है 

कुछ बिम्ब अनायास ही ध्यान आकर्षित करते हैं 

जिंदगी

दरकने लगी है

तप रही है जमीन,

पानी की बूंद

गायब हो जाती है

बहुत सुन्दर 

Comment by बृजेश नीरज on April 13, 2013 at 9:14pm

केवल भाई आपका आभार!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 13, 2013 at 8:25pm

आदरणीय बृजेश कुमार सिंह जी,  अतिसुन्दर मार्मिक रचना।  बधाई स्वीकारें।  सादर,

कृपया ध्यान दे...

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