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मिलना-बिछडना ::: ©

स्वप्न लोक से तू निकल आ ऐ रूपसी...
माना है जिंदगी चाहत का एक सिलसिला..
मिलना-बिछडना भी है लगा रहता यहाँ...
क्यूँ मांगती है आ सीख ले तू छीन लेना..
बिन मांगे न मिला है न तुझे मिलेगा कभी.. ©

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 11-11-2010 )



.

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Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on November 14, 2010 at 11:03pm
bilkul ◊ ◊ navin bhaiya ... bas inform kar dena........
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on November 14, 2010 at 10:04am
नवीन भईया...
अब तो आप लिख ही डालो एक रोमांटिक सा नगमा...
और आप पर कमेन्ट न करूँ ऐसा भला हो सकता है कभी...
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on November 14, 2010 at 10:03am
अलका जी ,, धन्यवाद....
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on November 14, 2010 at 10:03am
अरे छोटे कहाँ हो इतने दिन से...? नज़र नहीं आये...?

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 14, 2010 at 8:02am
बिल्कुल सही कहा जोगी भैया

क्यूँ मांगती है आ सीख ले तू छीन लेना..
Comment by alka tiwari on November 12, 2010 at 1:20pm
uttam taal-mel.

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