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आँख जैसे लगी, ख़ाक घर हो गया
जुल्म का प्रेत कितना निडर हो गया ।

कुछ दरिन्दों ने ऐसी मचाई गदर
खौफ की जद में मेरा नगर हो गया ।

थी किसी की दुकाँ या किसी का महल
चन्द लम्हों में जो खण्डहर हो गया ।

है नजर में महज खून ही खून बस
आज श्मसान 'दिलसुखनगर' हो गया ।

थी ख़बर साजिशों की मगर, बेखबर !
ये रवैया बड़ा अब लचर हो गया ।

कौन सहलाये बच्चे का सर तब 'सलिल'
जब भरोसा बड़ा मुख़्तसर हो गया ।

------  आशीष 'सलिल' (हैदराबाद)

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 8, 2013 at 7:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया वेदिका जी !

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 8, 2013 at 7:14pm

आदरणीय विजय सर......
आपको ग़ज़ल अच्छी लगी
तहे दिल से शुक्रिया |

Comment by वेदिका on March 8, 2013 at 4:47pm

है नजर में महज खून ही खून बस
आज श्मसान 'दिलसुखनगर' हो गया ।

बहुत खूब आशीष नैथानी 'सलिल' जी !
जिस घटना को केन्द्रित किया है, भयावह है वह, काश समझने वालों को समझने में आये यह बात या नासंझने वालों को।
शुभकामनाये
सादर वेदिका

Comment by vijay nikore on March 8, 2013 at 4:28pm

आदरणीय आशीश जी,

 

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 25, 2013 at 11:38pm

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय अभिनव जी....

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 25, 2013 at 11:37pm

धन्यवाद आदरणीय पवन जी....  गजल पसंदगी के लिए तहे दिल से शुक्रिया विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी जी.....

Comment by Abhinav Arun on February 25, 2013 at 3:18pm

है नजर में महज खून ही खून बस आज श्मसान 'दिलसुखनगर' हो गया ।

दर्दनाक हादसे पर केन्द्रित असरदार ग़ज़ल . हर शेर सोचने को विवश करता है . काश आवाज़ उन तक पहुंचे ...

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2013 at 12:24pm
सच हैदराबाद को वह दृश्य कितना वीभत्स था,हृदय विदारक।और यह निकम्मी सरकार को पता था कि धमाका होने वाला है।यह उससे भी अधिक वीभत्स है।आपने बहुत जीवंत चित्रण किया है,आपको तथा आपकी गजल को बधाई।
Comment by pawan amba on February 25, 2013 at 5:56am

ये रवैया बड़ा अब लचर हो गया ।......

बहुत खुबसूरत अंदाज़  है आपका 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 24, 2013 at 10:12am

तहे दिल से शुक्रिया भाई सन्दीप जी...

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