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हे शिव स्नेह के सागर ,
भर दो प्रेम गागर ,
मोह माया के तम से,
मुक्त कीजै आकर!


बंधनों से मुक्त करो ;
इतनी कृपा कर दो !
मुझे मलिन संसार से ,
अब तो पृथक कर दो !


कण -कण के आप वासी ,
मै सत्य से वंचित !
जीवन बंधन में घिरा
मै पाप से संचित !


बंधनों से परे आप ,
आप आदि-अंत हो !
मुझे प्रभो शरण में लो,
आप बड़े संत हो !


राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक /अप्रकाशित

Views: 369

Comment

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Comment by Dr.Ajay Khare on February 22, 2013 at 12:12pm

बंधनों से परे आप , आप आदि-अंत हो ! मुझे प्रभो शरण में लो, आप बड़े संत हो !

soch aapki umda hai bichar annant ho lekhan ke chetra ke aap mahant ho badhai 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 22, 2013 at 11:00am

बहुत सुंदर शिव स्तुति शुभ मंगल कामना

Comment by vijay nikore on February 20, 2013 at 9:42pm

 

 

कण -कण के आप वासी , मै सत्य से वंचित !

जीवन बंधन में घिरा मै पाप से संचित !

आपने मेरे मन की बात भी कह दी।

रचना के लिए बधाई।

विजय निकोर

 

Comment by ajay yadav on February 19, 2013 at 9:24pm

बहुत खूबसूरत ...

बंधनों से मुक्त करो ;
इतनी कृपा कर दो !
मुझे मलिन संसार से ,
अब तो पृथक कर दो ! बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on February 19, 2013 at 6:33pm

हे शिव स्नेह के सागर ,
भर दो प्रेम गागर ,
मोह माया के तम से,
मुक्त कीजै आकर!

भोले कल्याणकारी हैं।

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