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फुसलाने निकले

हम जिनको समझाने निकले
वो हमसे भी सयाने निकले

अनजाना समझा था जिनको
सब जाने पहचाने निकले

चेहरों पर लेकर खुशी
दर्द को छिपाने निकले

जिनको हमदम मान लिया था
दुश्मन वही पुराने निकले

जब पीने की दिल मे ठानी
बंद सभी मयखाने निकले

स्वांग ग़रीबी का करते थे
उनके घर तहख़ाने निकले

अब चुनाव जब सर पे आया
तो लोंगो को फुसलाने निकले

Dr. Ajay Khare Aahat

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Comment

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Comment by Dr.Ajay Khare on December 28, 2012 at 12:11pm

Sabhi atmiyjano ko hosla afjai hetu badhai

Comment by अमि तेष on December 26, 2012 at 11:31pm

बधाई ......

Comment by MAHIMA SHREE on December 26, 2012 at 1:33pm

हम जिनको समझाने निकले
वो हमसे भी सयाने निकले

चेहरों पर लेकर खुशी
दर्द को छिपाने निकले...
क्या बात है .. दिल से लिखी गयी गज़ल के लिए बहुत -2 बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 25, 2012 at 9:13pm

बहुत सुन्दर सार्थक ग़ज़ल लिखी है सभी शेर बढ़िया हैं आदरणीय गणेश जी की बात पर गौर करें बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 25, 2012 at 11:47am
सच्चाई का सपाट बयां करने पर बधाई डॉ अजय खरे भाई 
स्वांग ग़रीबी का करते थे, उनके घर तहख़ाने निकले
अब चुनाव जब सर पे आया,तो लोंगो को फुसलाने निकले - 
वोट मांगे देखा- वे तो बाजीगर निकले
बहला फुसला वोट ले गए -वे तो जादूगर निकले  
Comment by Shyam Narain Verma on December 25, 2012 at 10:39am

एकदम सच्चाई है, वाह बढ़िया पेशकश ,  बधाई स्वीकारें !

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on December 25, 2012 at 10:19am

अच्छे भाव लिए हुए गजल पर यह प्रयास बहुत अच्छा बन पडा है... शेष आ भाई गणेश बागी जी ने इंगित किया है...

सादर बधाई स्वीकारें....


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 25, 2012 at 10:10am

ग़ज़ल कहन के लिहाज़ से अच्छी है, वजन पर काम करने की जरुरत है , दाद कुबूल करें आदरणीय |

Comment by vijay nikore on December 24, 2012 at 6:00pm

एकदम सच्चाई है आपकी कविता में। बधाई।

विजय निकोर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 24, 2012 at 3:52pm

वाह अजय जी वाह बढ़िया पेशकश बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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