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का भाई जी ध्यान बा न ?

का भाई जी ध्यान बा न ?
बड़ा ही अजीब शब्द है,लेकिन आजकल धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है भैया.....ये शब्द मानो लोगो की परछाई बन के चिपक सी गयी है ......जी ये शब्द है चुनावी महाकुम्भ में डुबकी लगाने के वास्ते उतरे हुए उम्मीदवारों के ...राह चलते हुए किसी पहचान वाले को देख लिए तो जल्दी से गाड़ी रुकवाते है ...और हाथ जोड़ते हुए कहते है "का भाई जी ध्यान बा न?" या "का जी बाबा तनी हमरो पर ध्यान देब"
कुछ भी कहा जाये पर बिहार के उन जिलो में चुनावी महापर्व रंग ला रहा है, जहा अभी चुनाव होना बाकि है. लोग इस रंग में रंगने को पूरी तरह तैयार है. कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देता. आखिर यह पर्व ५ सालो के बाद जो आता है .
दिन भर गाओं में गाडियों का आना जाना .....एक अभी गए नहीं की दुसरे हाजिर है. भाई इस पर्व का तो आनंद ही कुछ और है. यह मुसीबत केवल गरीबो और गाँव वालो के लिए ही नहीं है .....अगर आपकी थोड़ी सी पहुच है समाज में, या जान पहचान है तो आपके लिए और भी बड़ी मुसीबत है, सुबह -सुबह फ़ोन आएगा और कोई पूछेगा "बाबा कहाँ बानी? आज आपन एक घंटा समय दे देती त" आ गयी मुसीबत यह सोच कर हा कहना पड़ता है ! आईये अब बाते करते है किसानो की, इनकी तो सबसे जयादा चांदी रहती है जो खादी वाला कुरता -पैजामा या धोती- कुरता श्रीमती जी के बक्से में महीनो से दम घुट रहा होता है वो निकलता है इसी महापर्व में. खादी झारकर सुबह -सुबह ही बैठे है द्वार पर ,एक घंटा बिता नहीं की सोचने लगे "आज कोई पार्टी नहीं आया !क्या बात है"?
इतने में चमचमाती हुई गाड़ी आई और नारे लगने लगे, जिंदाबाद..जिंदाबाद, उस जिंदाबाद वाले नारे में से कोई निकल के कहता है "अरे पाण्डेय जी, महाराज आपके लिए ही तो आये फलनवा आदमी,चलिए चलिए, आज जाना है आपके सम्बन्धी के गाँव के तरफ प्रचार में" इधर पाण्डेय जी के मन में लड्डू फुट रहे है चलो आज का तो काम बना !
अब बाते करते है चौक पर के नेताओं की, भैया सबसे ज्यादा अगर कोई माल मारता है तो वो यही है. पार्टी आई नहीं की दावा ठोक दिए, भाई हमारे पास तो ५०० वोट है, फलाने जाती का, मैं जहाँ कहूँगा वही देंगे ये लोग. भाई मामला अब ५०० वोट का है उम्मीदवार को तो सोचना जरुरी है , बेचारे प्रत्याशी ने दे दिया ५ हजार का बण्डल और देकर बोला "भैया मेरे पैसे का लाज रखियेगा" लेकिन उस उम्मीदवार को क्या पता कि उससे पहले भी किसी ने इस आदमी को बण्डल देकर गया है और यही बात भी बोला है और ऐसे ऐसे ही करके बेचारे ये पुरे साल की कमाई कर लेते है और बेचारे पिछड़े जाति वाले अपनी समस्या ही सुनाते रह जाते है और गाड़िया गिनते रह जाते है.
यही है इस चुनावी महापर्व का कच्चा चिटठा.

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Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on October 29, 2010 at 10:48pm
वोटों के दलालों और सौदागरों के क्रिया कलाप का बेहतरीन चित्रण है रत्नेश जी ..काश जनता के वोटों की खरीदारी से बचा जाना संभव होता तो देश में चौतरफा उन्नति की बहार आयी होती...सुन्दर रचना के लिए आभार

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