For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

रेत में जैसे निशां खो गए

रेत में जैसे निशां खो गए

हमसे तुम ऐसे जुदा हो गए

 

रात आँखें ताकती ही रहीं

मेहमां जाने कहाँ सो गए

 

सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें

छोड़कर मझधार में खो गए

 

बोझ लेकर आपके पाप का

कांधे  में अपने उसे ढो गए

 

मिलने का वादा किया था मगर

हिचकियाँ देकर वो गुम हो गए

 

कौन आया है सदा के लिए

हम गए जो आज कल वो गए

 

Views: 583

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by rajluxmi sharma on December 10, 2012 at 10:25pm

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है...हार्दिक बधाई

Comment by नादिर ख़ान on December 7, 2012 at 11:27am

बहुत शुक्रिया अदरणीय प्राची जी 

बहुत  आभार ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 7, 2012 at 10:21am

आदरणीय नादिर खान जी,

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आपने.

मतला और पहला शेर ख़ास तौर पर बहुत पसंद आये....हार्दिक बधाई स्वीकार करे.

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 10:11pm

chandresh ji बहुत  शुक्रिया, आपने रचना को सराहा 

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 9:45pm

अदरणीय सौरभ जी सुझाओ के लिए बहुत शुक्रिया इसी तरह का मार्गदर्शन बनाये रखें ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 6, 2012 at 7:34pm

यहाँ पर सो इसलिये लिया है कि, जिन्हे रहनुमाई सौपी थी वो सो गए  हमें मझधार मे छोड़ कर... वैसे इस सो गए  और खो गए ने हमें भी 2 दिन परेशान किया था

नादिर भाई, आपकी बात भी अपनी जगह सही है. मैं भी इस पर यथोचित सोचा कि सो गये  रहने दूँ या खो गये समीचीन होगा.

पूरा शेर यों है -

सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें
छोड़कर मझधार में सो गए ..........   एकबारगी पढने पर लगता है कि जिन्हें रहनुमाई सौंपी गयी थी वे सौंपने वालों को छोड़ कर  खुद मझधार में  जाकर सो गये.  जबकि यह अर्थ बिल्कुल नहीं है. इसी दुविधा को खत्म करने के लिए मेरा खो गये सुझाव था, जिसके अनुसार अब जिन्हें रहनुमाई सौंपी गयी थी वे सौंपने वालों को मझधार में छोड़कर खो गये या वे खुद ही मझधार में कहीं खो गये, चाहे जो समझा जाय, अर्थ दोनों ढंग में अपने हिसाब से वाज़िब निकलेगा. वैसे भाईसाहब, शेर आपका है.  :-))

शुभेच्छाएँ

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 6, 2012 at 6:52pm

बहुत खूब नादिर खान जी | बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है |

 

सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें

छोड़कर मझदार में सो गए

 

बोझ लेकर आपके पाप का

कांधे  में अपने उसे ढो गए

क्या बात है जनाब ||

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 4:18pm

महिमा जी  आपका बहुत शुक्रिया आपने रचना को पसंद किया ।

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 4:17pm

अदरणीय सौरभ जी बहुत शुक्रिया आपने कोशिश को सराहा और आपके मार्गदर्शन के लिए बहुत आभार

हमने मझधार की त्रुटि सुधार ली है ।

 सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें
छोड़कर मझदार में सो गए  

यहाँ पर सो इसलिये लिया है कि, जिन्हे रहनुमाई सौपी थी वो सो गए 

हमें मझधार मे छोड़ कर... वैसे इस सो गए  और खो गए ने हमें भी 2 दिन परेशान किया था ।

कृपया मार्गदर्शन दें 

Comment by MAHIMA SHREE on December 6, 2012 at 3:39pm

कौन आया है सदा के लिए

हम गए जो आज कल वो गए....

बहुत खूब ... आदरणीय बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
2 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
2 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
3 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

बरसात

बरसात घन गरजे अंधियारी छाई,बिजली अम्बर पर इठलाई  बूँदें टपकी टप-टप भाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई पत्ते…See More
Sunday
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"Dear respected Admin team: A few minutes ago, I typed my suggestion, but lost it all before it was…"
Saturday
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"..."
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  आदरणीय,  तकनीकी दृष्टिकोण से मैं कुछ  अधिक नहीं कह सकता । किन्तु यदि हमारा …"
Jun 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी विद्वद्जन अपने-अपने हिसाब कुछ न कुछ चर्चा कर रहे हैं, उपाय बता रहे हैं, आदरणीय ..  आप भी…"
Jun 12

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service