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ग़ज़ल : आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

बहर : २१२२ ११२२ ११२२ २२ 

रह गया ठूँठ, कहाँ अब वो शजर बाकी है

अब तो शोलों को ही होनी ये खबर बाकी है

है चुभन तेज बड़ी, रो नहीं सकता फिर भी

मेरी आँखों में कहीं रेत का घर बाकी है

रात कुछ ओस क्या मरुथल में गिरी, अब दिन भर

आँधियाँ आग की कहती हैं कसर बाकी है

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है

तू कहीं खुद भी न मर जाए सनम चाट इसे

आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

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Comment by इमरान खान on November 13, 2012 at 12:16pm
वाह वाह वाह
कमाल के अशआर, खूबसूरत गज़ल
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 12, 2012 at 7:39pm

रात कुछ ओस क्या मरुथल में गिरी, अब दिन भर

आँधियाँ आग की कहती हैं कसर बाकी है   -------बहुत खूब 

तू कहीं खुद भी न मर जाए सनम चाट इसे

आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है--------------उम्दा गजल 

हार्दिक बधाई भाई श्री धर्मेन्द्र सिंह जी, दीपावली सपरिवार हार्दिक शुभ कामनाए स्वीकारे 

Comment by PHOOL SINGH on November 12, 2012 at 2:34pm

धर्मेन्द्र  जी  नमस्कार ,

"आपको दीपावली की शुभ कामनाएँ "

फूल सिंह

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