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राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ४० (वही घर के कोने अपना मुंह छुपाए, वही रास्ते में तुम्हारी यादों के नक्श.. शरमाए शरमाए)

घरों में सीलिंग फैन्स की घड़घड़ाहट बंद सी होने लगी है और दिन सुबुकपा और रातें संगीन. मौसम ने करवट की इक गर्दिश पूरी की हो जैसे- धूप की शिद्दत खत्म होने लगी है और सुकून और मुलायमियत के झीने से सरपोश के उस तरफ साकित ओ मुतमईन, आयंदा और तबस्सुमफिशाँ कुद्रत के नए रूप का एहसास होने लगा है. घर की हर शै जैसे तपिश भरी दोपहरियों से सज़ायाफ्ता ज़िंदगी की नींद से बेदार होने लगी है और जल रहे लोबान के धुंए की तरह दूदेसुकूत फजाओं में फ़ैल रहा है. ये आमदेसरमा (जाड़े के मौसम के आगमन) के बेहद इब्तेदाई रोज़ हैं और ऐसे में ज़िंदगी के एक हाथ में जाते हुए मौसम के साथ का छूटता दामन तो दूसरे हाथ में आती हुई फ़स्ल के दोशीज़ा हुस्न का आँचल है. ये वो लम्हा है जब दर्द और मुसर्रत से ज़िंदगी यकलम्हा मुखातिब होती है, जब एक आँख में खुशी के आंसूं तैरते तो दूसरी में दुःख के कतरे झिलमिलाते हैं.

 

भोपाल के अपने घर की हज़ार मुनफरिद सुबहों सी ही कोई सुबह है आज की भी. वही दरो-दीवार के बेज़ुबां साये, वही फर्शोबाम में महदूद ज़िंदगी के सोते-जागते सरमाये, वही काली सड़कें अपना सीना बिछाए, वही शजरोदरख़्त अपना सर उठाए, वही घर के कोने अपना मुंह छुपाए, वही रास्ते में तुम्हारी यादों के नक्श.. शरमाए शरमाए ! सब कुछ वही है मगर बदलते मौसम के रियाज़ में अहसास में उठने वाला आहंग भी कितना बदला बदला नज़र आता है.

 

© राज़ नवादवी

भोपाल, शुक्रवार २६/१२/२०१२, पूर्वाह्न ११.३७

 

सुबुकपा (तेज कदमों से जाने वाले); संगीन (भारी/गहरी); गर्दिश (चक्कर); शिद्दत (तेज़ी); सुकून (शान्ति); सरपोश (आवरण); साकित (निस्तब्द्ध); मुतमईन (आश्वस्त); आयंदा (आनेवाली); तबस्सुमफिशाँ (मुस्कुराहट की वर्षा करती); कुद्रत (प्रकृति); शै (चीज़); तपिश (गर्मी); सज़ायाफ्ता (सज़ा पायी); बेदार (जागृत); लोबान (अगरबत्ती); दूदेसुकूत (निस्तब्द्धता का धुंए); आमदेसरमा (जाड़े के मौसम के आगमन); इब्तेदाई (प्रारंभिक); फ़स्ल (मौसम); दोशीज़ा (तरुण, युवा); मुसर्रत (प्रसन्नता, आनंद); मुनफरिद (एक अकेली); बाम (छत); महदूद (सीमित); सरमाये (पूंजी); शजरोदरख़्त (पेड़-पौधे); रियाज़ (आलाप); आहंग (संगीत, आवाज़)

 

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Comment by राज़ नवादवी on October 30, 2012 at 2:17pm

तहेदिल से शुक्रिया आदरणीया राजेश जी. ये कशिश एक शिकस्ता दिल की ठंढी आह ही तो है, जो माज़ी (अतीत) की बेरंग यादों के तजाजुब (गुरुत्वाकर्षण) के ज़ेरेअसर (प्राभाव में) कहीं जाती भी नहीं, वरना गर्म हो के आसमान का रुख न  ले लेती? हा हा हा हा ! दिल कहाँ बसता है कहीं, भोपाल में तो बस... हम रहते हैं. दिल तो सुदूर पूरब के कोहसार में (घाटियों में) कहीं खो सा गया और बाकी रह गया इक शख्स जो राज़ नवादवी है.


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Comment by rajesh kumari on October 30, 2012 at 9:39am

ऐसे में ज़िंदगी के एक हाथ में जाते हुए मौसम के साथ का छूटता दामन तो दूसरे हाथ में आती हुई फ़स्ल के दोशीज़ा हुस्न का आँचल है

क्या बात है राज़ साहब आपकी ग़ज़ल हो या संस्मरण आपके लिखने के  अंदाज़ में एक कशिश है जो आकर्षित करता है पढने के लिए बहुत बहुत बधाई आपको लगता है भोपाल में आपका दिल बसता है

Comment by राज़ नवादवी on October 26, 2012 at 3:51pm

जी ज़रूर भाई लक्ष्मण जी, अब तो खास एहतियात बरतनी होगी, एक बड़ी फ़िल्मी हस्ती को पहले ही मच्छर ले डूबे हैं, अपनी क्या बिसात है!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 26, 2012 at 3:30pm

सावधान रहे | स्वस्थ रहे |रब्बा खैर करे | 

Comment by राज़ नवादवी on October 26, 2012 at 3:21pm
हाहाहा भाई लक्षण जी,सही फरमाया आपने, ये संक्रमण का दौर न इधर का छोड़ता है और न उधर का. पंखा चलाओ तो ठंढ लगती है और बंद करो तो मच्छरों की ऐश. मौसम का बदलाव भी प्रसव जैसा है, पीड़ा तो झेलनी ही होगी. सादर.
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 26, 2012 at 3:15pm
भाई राज दवा नवी जी आपकी डायरी के पन्ने ने बदलते मौसम से बेखबर से मुझे खबर कर दिया |
एक ओर सीलिंग फेन गडगडाहट का डर तो दूसरी ओर मच्छर काटने का डर, बीमार हो जाने का खतरा |
सावधान करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद भाई जी 
Comment by राज़ नवादवी on October 26, 2012 at 3:10pm
आदरणीया सीमा जी, मगर आपके प्रतिक्रियात्मक शब्द "शब्द यूं लगे जैसे धीमे धीमे गीत गुनुगुनाते हुए बहती हवा" भी अपने आप में किसी गीत के बोल जैसे ही लगे. बहुत खूब. सादर!
Comment by राज़ नवादवी on October 26, 2012 at 2:59pm
आदरणीय बागी जी, आपकी सरहाना पाकर हृदय गदगद हुआ. सादर आभार!
Comment by राज़ नवादवी on October 26, 2012 at 2:59pm
आपका दिल से आभार आदरणीय सीमा जी.
Comment by seema agrawal on October 26, 2012 at 2:28pm

वाह और वाह ...खूबसूरत अहसास जाते और आते हुए पलों का  ...शब्द यूं लगे जैसे  धीमे धीमे  गीत गुनुगुनाते हुए बहती हवा
कमाल का लेखन है आपका ...बधाई राज़ जी 

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