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रिटायरमेंट ( लघु कथा )

रिटायरमेंट ( लघु कथा )

शर्मा जी, लेखाधिकारी  अपनी उदार प्रवर्ति एवं मिलनसारिता के मामले में सदैव अग्रणी रहे  .खुशी हो या किसी पे दुःख मुसीबत, बस इन्हें पता भर लग जाए. जी जान से सेवा में जुट जाते . चाय पीना और पिलाना उनकी हाबी रही . सड़क हो या दफ्तर कोई परिचित मिल भर जाए. फिर क्या एक प्याला चाय हो जाये. मैं तो इनसे नजरे छुपा के निकल जाता कि अनावश्यक  व्ययभार न बढे. 
मेरा तबादला अन्य जनपद में होने के कारण काफी वर्षों से इनसे मुलाकात नहीं हुई. स्मृति में इनकी याद भी  हलकी पड़ गयी. 
दिवाली से पहले घर की पुताई कराने  के प्रयोजन से प्रातः मजदूर लेने निकला. रास्ता जाम होने के कारण मार्ग बदलना पड़ा. याद  आया की शर्मा जी इसी कोलोनी में रहते हैं. स्वार्थी मन एक तरफ चाह रहा था कि इनके दर्शन कर लिए जाएँ, दूसरी तरफ ये चिंता थी कि देर से मजदूर लेकर पहुंचा तो काम प्रभावित होगा. इसी उधेड़ बुन  में चला जा रहा था कि आवाज आई, वर्मा जी इतने सुबह सुबह कहाँ. स्कूटर के ब्रेक  स्वतः लग गए. शर्मा जी के चेहरे पर वो ही  चिर परिचित मुस्कान , अपनापन. वे लान में पौधों को पानी दे रहे थे .
जल्दी जल्दी आपने हाल चाल बताये और यात्रा का प्रयोजन बताया और मन ही मन सोच रहा था कि ये कहीं चाय पीने  का आग्रह न कर दें. शर्मा जी कहाँ चूकने वाले थे, उन्होंने घर में दो चाय  का हुक्म दे डाला. लान  में पड़ी कुर्सी पर मुझे बिठा दिया और खुद पौधों में पानी लगाते हुए घर परिवार , यार दोस्तों का हाल पूंछने लगे. समय बीतता गया मेरी बैचेनी बढ़ रही थी कि अब चला जाये. मेरी नजरों से शर्मा जी की  भी बैचेनी छिपी न रह सकी, उनकी आँखें घर के दरवाजे से चाय  के आने की प्रतीक्षा जो कर रही थी. पन्द्रह मिनट बीत गए और चाय नहीं आई तो मैने कहा अब काफी देर हो गयी है चाय कभी इत्मीनान से पी जायेगी, आज्ञा दीजिए. शर्मा जी ने पाइप नीचे  रखा , नल बंद किया और तपाक से बोले आइये वर्मा जी, यहीं पास में एक बढ़िया चाय बनाता है, वहीँ आपको पिलाता हूँ, आप भी याद रखेंगे  उसके स्वाद  को. सुबह की चाय मैं वहीँ पीता हूँ. 
शर्मा जी आप कब रिटायर हुए? 

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on October 26, 2012 at 1:39pm

आदरणीय राज जी,

सादर अभिवादन 

आप बहुत लिख रहे हैं. बीमारी के कारण मंच से दूरी है. 

प्रोत्साहन हेतु आभार. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on October 26, 2012 at 1:37pm

आदरणीया विनीता जी, 

सादर अभिवादन.

स्नेह देती रहियेआभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on October 26, 2012 at 1:36pm

आदरणीय योगराज जी, 

सादर अभिवादन 

आज मन खुश हुआ. आप की कृपा है. 

आभार. 

Comment by राज़ नवादवी on October 26, 2012 at 12:52pm

बड़ी ही मार्मिक इन्तेहा है इस कहानी की. आदमी वक्त और उससे ज़्यादा अपनों के हाथो कितना माजूर हो जाता है कि बाहर तो चाय का इक प्याला खरीदा जा सकता है मगर अपने ही घर की रसोई में बनी चाय का ज़याका नसीब नहीं हो सकता. इक सुबुकदोश (सेवानिवृत्त) फर्द की ज़िंदगी की दुखभरी सच्चाइयों को सामने रखती दिल को छू लेने वाली कहानी. बधाई हो आदरणीय कुशवाहा जी! 

Comment by Vinita Shukla on October 26, 2012 at 11:28am

आदरणीय कुशवाहा जी, सेवानिवृत्ति के बाद, एक आम इंसान के जीवन में आये बदलाव का मार्मिक चित्रण. बहुत बहुत बधाई.


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 26, 2012 at 9:20am

बहुत ही सुन्दर लघुकथा कही है अग्रज प्रदीप सिंह कुशवाहा जी, रचना न केवल पाठक को सन्न कर देती है बल्कि बहुत कुछ सोचने पर विवश भी करती है, मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on October 25, 2012 at 4:41pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी 

सादर अभिवादन.

ये सत्य घटना है. शायद मेरा भविष्य भी. 

आपकी प्रतिक्रिया ने मुझे अभिभूत कर दिया. 

स्नेह देती रहिये. फासले कम हो जायेंगे 

बचे दिन जिंदगी के आराम से गुजर जायेंगे.

आभार.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on October 25, 2012 at 4:38pm

आदरणीया सीमा जी, 

सादर अभिवादन.

आपने याद रखा. प्रोत्साहित किया. आभार. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on October 25, 2012 at 4:37pm

आदरणीय शालिनी जी, 

सादर अभिवादन.

आपने समय दिया. पीड़ा समझी .आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on October 25, 2012 at 4:36pm

आदरणीय उमाशंकर जी

सादर अभिवादन.

मैं आपको याद करता रहता हूँ.

आभार. स्वस्थ हो रहा हूँ. 

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