For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मेरे सपनो का भारत

मेरे सपनो का भारत ऐसा तो नहीं था
इतना कमजोर , इतना खोखला
ऐसा देश तो मैंने कभी चाहा ही नही था
बाहर से जितना साफ अंदर से उतना ही गन्दा
मेरे सपनो का भारत ....................

सोचा था मैंने तो कि ये चमन खूब महकेगा
अपने परिंदों के चहकने से खूब चहकेगा
मगर ये क्या --- इसे तो इसके ही फूलो ने कांटे चुभोये
लहू देशभक्तों का बो कर भी गद्दार उगाये
मेरे सपनो का भारत ये तो नहीं था
मेरे सपनो का भारत ऐसा ......................
.
मैंने चाहा था क्या , ये कैसा हो गया
रूप आधुनिकता का लेकर, अपनी ही संस्कृति से जुदा हो गया
प्यार से जिस मिटटी को सींचा था पूर्वजो ने
आज उसी में नफरतो के बीज उग गये है
जहाँ रहते थे मिलकर प्यार से हर मजहब के लोग
उसी देश में आज भाई - भाई के दुश्मन हो गये है
मेरे सपनो का भारत ये तो नहीं था
मेरे सपनो का भारत ऐसा .........................

राम की भूमि अब राम की न रही
यहाँ रावण का देखो अधिकार हो गया है
मिल गई है आजादी विदेशियों से हमें
लेकिन अपना ही घर अब डराने लगा है
कौन जाने कब, कौन किसे लूट ले
खून अपना ही जब पानी हो रहा है
मेरे सपनो का भारत ये तो नहीं था
मेरे सपनो का भारत ऐसा...............

जो उगाता है अन्न , वही भूखा रह जाता है
पेट भरता है सबका मगर देखो न
अन्नदाता ही अपना .............
लाचार और गरीब कहलाता है
अब कहूँ और क्या मैं तो लुट सा गया
मेरे सपनो का भारत जाने कहाँ खो गया
मेरे सपनो का भारत ये तो नहीं था
मेरे सपनो का भारत ऐसा...............

Views: 776

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 5, 2012 at 12:58pm

निराशा अच्छी बात नहीं 

कदम से कदम मिलाओ 

भारत को महान बनाओ.

Comment by Ashok Kumar Raktale on September 11, 2012 at 7:25pm

सोचा था मैंने तो कि ये चमन खूब महकेगा
अपने परिंदों के चहकने से खूब चहकेगा

बहुत सुन्दर सपने थे किन्तु विदेशी परिंदों ने डेरा डाल दिया और इन सपनों को सपना ही बना दिया. बधाई सोनम जी.

Comment by Sonam Saini on September 11, 2012 at 12:59pm

नमस्कार महिमा जी..........

Welcome back
महोत्सव में भाग लेना चाहती थी लेकिन ले नही पायी, शनिवार और रविवार को मेरी छुट्टी होती है
और महोत्सव भी इन दो दिनों में ही होता है इसीलिए रह गयी...............!!

kavita ko pasand krne ke liye  bahut bahut shukriya .............

Comment by Sonam Saini on September 11, 2012 at 12:56pm

शुक्रिया रेखा मैम, आपने अपना  कीमती समय दिया

thanks a lot.................

Comment by MAHIMA SHREE on September 11, 2012 at 12:56pm

सोचा था मैंने तो कि ये चमन खूब महकेगा 
अपने परिंदों के चहकने से खूब चहकेगा 
मगर ये क्या --- इसे तो इसके ही फूलो ने कांटे चुभोये
लहू देशभक्तों का बो कर भी गद्दार उगाये 
मेरे सपनो का भारत ये तो नहीं था
मेरे सपनो का भारत ऐसा ......................

सोनम जी नमस्कार ... बढ़िया प्रस्तुति  है .. बधाई आपको   .. महोत्सव में क्यों भाग नहीं लिया ?

Comment by Sonam Saini on September 11, 2012 at 12:54pm

ji Bhawesh ji

आशाएं तो जिन्दा है ही ................बहुत बहुत धन्यवाद कविता को पसंद करने के लिए

Comment by Sonam Saini on September 11, 2012 at 12:52pm

Thank you very much yogi sir

Comment by Rekha Joshi on September 10, 2012 at 8:04pm

जो उगाता है अन्न , वही भूखा रह जाता है
पेट भरता है सबका मगर देखो न 
अन्नदाता ही अपना .............
लाचार और गरीब कहलाता है.अति सुंदर अभिव्यक्ति सोनम जी ,बधाई 

Comment by Bhawesh Rajpal on September 10, 2012 at 3:24pm

बहुत खूब !  कितने सुन्दर सपने संजोये थे अपने भारत के लिए !

आजकल भारत में एक जाती पाई जाती है " नेता" , हम सबके सपनों पर पानी फेर दिया इस जाती ने !

सारे प्राकृतिक सम्पदा को लूट कर स्विस बैंक में जमा कर दिया , इस सम्पदा के बूते ही तमाम लोगों के सपने साकार होते !  लेकिन करता-धर्ता ही लुटेरे हो गए !  फिर भी हमारी आशाएं जीवित हैं !

Comment by Yogi Saraswat on September 10, 2012 at 10:30am

राम की भूमि अब राम की न रही
यहाँ रावण का देखो अधिकार हो गया है
मिल गई है आजादी विदेशियों से हमें
लेकिन अपना ही घर अब डराने लगा है
कौन जाने कब, कौन किसे लूट ले
खून अपना ही जब पानी हो रहा है
मेरे सपनो का भारत ये तो नहीं था
मेरे सपनो का भारत ऐसा...............

बहुत सुन्दर , सच कहा आपने यही हाल है इस देश का ! सार्थक एवं सुन्दर शब्द सोनम जी ! बधाई

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
10 hours ago
Admin posted discussions
11 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
Wednesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Feb 15
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
Feb 14
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
Feb 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service