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दोहा कहे मुहावरा: खोल देखकर आँख --संजीव 'सलिल'




दोहा कहे मुहावरा:
खोल देखकर आँख
संजीव 'सलिल'
*


रवि-किरणें टेरें तुझे, देख खोलकर आँख.
आलस तज उठ जा 'सलिल', लग न जाए फिर आँख..
*



आँख मिलाकर आँख से, डाल आँख में आँख.
खुली आँख सपने दिखे, खुली रह गयी आँख..
*


आँख बंदकर आँख को, राह दिखाये आँख.
हाथ थामकर आँख का, गले लगाये आँख..
*

बाधा से टकरा पुलक, घूर मिलाकर आँख.
संकट-कंटक दूर हो, आप झुकाकर आँख..
*


मिली आँख से आँख तो, खुली रह गयी आँख.
पलक न झपकीं डाल दी, जब आँखों में आँख..
*


बसा लिया है आँख में, 'सलिल' मूँदकर आँख.
अपलक देखे प्रभु-छवि, झपक न जाए आँख..
*


फूटी आँख न आँख को, तनिक सुहाये आँख.
आँख लाल कर आँख से, आँख फिराए आँख..
*


सपने सचकर मुस्कुरा, भर-भर आये आँख.
तारा बनकर आँख का, लाड़ लड़ाये आँख..
*


आँख न ऐसा काम कर, पड़े झुकाना आँख.
भूल-चूक हो जाए तो, विनत नवाना आँख..
*


आँख कह रही आँख से, मत नटेरना आँख.
आत मुझको भी मगर, क्यों तरेरना आँख..
*


गले लगा ले आँख को, डबडबाये जब आँख.
गिरे उठा आगे बढ़ा, खिलखिलाए फिर आँख..
*


अपनी नज़र उतार ले, राई-नौन ले आँख.
खुद को खुद पर वार दे, जग उजारकर आँख..
*


जान-बूझ टकरा रही, फूट गयी क्या आँख.
आँख चुराकर आँख को, लूट ले गयी आँख..
*


मिली झुकी उठ मिल खिली, जब टकरायी आँख.
चैन लूटकर आँख का, झट शरमायी आँख..
*


सपने पाले आँख में, बैठे ठाले आँख.
उठ कोशिश कर रुक नहीं, सपने पा ले आँख..
*








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Comment

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Comment by Albela Khatri on June 13, 2012 at 8:12pm

आदरणीय  संजीव 'सलिल' जी,
आँखों पर आपकी  मनोरम चित्रावली से सजी-संवरी  अनुपम दोहावली बांच  कर  इस बालक की आँखें  फटी की फटी रह गयीं .

यों लगा  मानो  पूरी देह पर आँखें उग आई हैं  और हर आँख  पर आपकी आँख  टिकी हुई है.  वाह ! वाह !  क्या कहने....कितनीं आँखों से देखा है आपने आँखों को..........आपकी आँखें प्रणम्य है प्रभु !

जान-बूझ टकरा रही, फूट गयी क्या आँख.
आँख चुराकर आँख को, लूट ले गयी आँख..

_____बधाई बधाई बधाई ............

Comment by AVINASH S BAGDE on June 13, 2012 at 7:00pm

फूटी आँख न आँख को, तनिक सुहाये आँख.
आँख लाल कर आँख से, आँख फिराए आँख..wah!...umda!!

Comment by AVINASH S BAGDE on June 13, 2012 at 6:59pm

आँख मिलाकर आँख से, डाल आँख में आँख.

खुली आँख सपने दिखे, खुली रह गयी आँख..

 

मिली झुकी उठ मिल खिली, जब टकरायी आँख. 
चैन लूटकर आँख का, झट शरमायी आँख..

अपनी नज़र उतार ले, राई-नौन ले आँख.
खुद को खुद पर वार दे, जग उजारकर आँख..

 

aapki ye prastuti dekh आँख..fati ki fati rah gai..Aachary Salil ji.

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on June 13, 2012 at 3:41pm

bahut hi sundar dohe hein salil ji bahut bahut mubarakbad

Comment by Bishwajit yadav on June 13, 2012 at 2:21pm
आदरणीय सलिल जी
बहुत सुन्दर जय हो
Comment by Yogi Saraswat on June 13, 2012 at 12:07pm

आदरणीय सलिल जी , सादर 

सामयिक सुन्दर रचना. प्रशंशा हेतु शब्द नहीं हैं.

आखिर में आपने जो चित्र दिया है उसमें जो सन्देश है , बहुत प्रेरणादायक है ! बधाई एक अच्छा सन्देश देने के लिए

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 13, 2012 at 10:39am

आदरणीय सलिल जी , सादर 

सामयिक सुन्दर रचना. प्रशंशा हेतु शब्द नहीं हैं.

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है.

कृपया ध्यान दे...

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