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याद तुम्हारी आते ही मन व्याकुल हो जाता है,
छूट गया वो साथ जो कभी नहीं फिर आता है.
 
कितना था आनंद कितना था फिर प्यार वहां,
कितने थे कोमल सपने कितने थे अरमान वहां.
बिजली सी चंचलता थे तूफानो सा उन्माद वहां,
रूठ गया किसी बात पे मीत बहुत याद आता है.
                          याद तुम्हारी आते ही मन .......................
छोटे छोटे गुड्डे गुडिया, छोटी अपनी दुनिया थी,
छोटे छोटे स्वप्न गढ़े थे, छोटी उनकी कड़ियाँ थी,
छोटे छोटे खेल खिलौने, छोटी अपनी बगिया थी,
उड़नपरियों वाला किस्सा अब भी मन को भाता है.
                            याद तुम्हारी आते ही मन .......................
मेरे मन के इक कोने में सदा तुम्हारा वास रहा,
भूल  सका ना कभी तुम्हे सदा तुम्हारा भास रहा,
दूर गया मै निकल फिरभी ह्रदय तुम्हारे पास रहा,
फूलों पे तितली का आना अब भी मुझको भाता है.
                              याद तुम्हारी आते ही मन .......................
तेरे जाते ही यौवन आया आयी जिम्मेदारी भी,
रोक सका ना तेरा जाना उफ़ क्या मजबूरी थी,
धरती अम्बर में जीतनी उतनी ही अब दूरी थी,
जीवन में बचपन ही क्यूँ सबसे पहले आता है,
                                याद तुम्हारी आते ही मन .......................

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on May 18, 2012 at 6:19pm

रेखा जी
          सादर, सही कहा आपने बचपन के दिन भी क्या दिन थे.जब भी याद आते हैं गुदगुदाते रहते हैं. धन्यवाद.

Comment by Rekha Joshi on May 17, 2012 at 10:49pm

अशोक जी ,बचपन के दिन भी क्या दिन थे ,अच्छी प्रस्तुति पर बधाई |


Comment by Ashok Kumar Raktale on May 9, 2012 at 9:30pm

आदरणीय जवाहर जी भाई एवं राजेश कुमारी जी सादर, मेरी रचना को सराहने एवं उसके साथ स्वयं को जोड़ने के लिए धन्यवाद. आपकी प्रतिक्रया मेरे लिए प्रोत्साहन स्वरुप रहेगी.


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Comment by rajesh kumari on May 9, 2012 at 5:09pm

मेरे मन के इक कोने में सदा तुम्हारा वास रहा,

भूल  सका ना कभी तुम्हे सदा तुम्हारा भास रहा,
दूर गया मै निकल फिरभी ह्रदय तुम्हारे पास रहा,
फूलों पे तितली का आना अब भी मुझको भाता है.
अशोक कुमार जी बहुत सुन्दर लिखा है  बचपन के ऊपर, सच में हम आज भी अपने बचपन को कितना याद करते हैं और बचपन का कोई साथी ख़ास हो तो फिर क्या ही कहने यह आपकी कविता बाखूबी बयान कर रही है बधाई आपको 
    
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 9, 2012 at 5:26am
मेरे मन के इक कोने में सदा तुम्हारा वास रहा,
भूल सका ना कभी तुम्हे सदा तुम्हारा भास रहा,
दूर गया मै निकल फिरभी ह्रदय तुम्हारे पास रहा,
फूलों पे तितली का आना अब भी मुझको भाता है.
याद तुम्हारी आते ही मन .......................
आदरणीय अशोक भाई जी, ..बचपन की यादे ताजा कर दी आपकी कविता ने .

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति बधाई स्वीकार करें!
Comment by Ashok Kumar Raktale on May 8, 2012 at 10:09pm

महिमा जी सादर,
                           हर मन में बसा बालपन एकसा ही तो है.जीवन का सबसे अच्छा वक्त.मगर अब सिर्फ यादें ही तो बाकी है. रचना पसंद करने के लिए धन्यवाद.

Comment by MAHIMA SHREE on May 8, 2012 at 10:01pm
छोटे छोटे गुड्डे गुडिया, छोटी अपनी दुनिया थी,
छोटे छोटे स्वप्न गढ़े थे, छोटी उनकी कड़ियाँ थी,
छोटे छोटे खेल खिलौने, छोटी अपनी बगिया थी,
उड़नपरियों वाला किस्सा अब भी मन को भाता है.---

आपने तो हमारी मन की बात कह दी

आदरणीय अशोक सर ..बचपन की यादे ताजा कर दी आपकी कविता ने .

बहुत ही sunder prastuti बधाई स्वीकार करें

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 8, 2012 at 9:56pm

 सरिता जी सादर नमस्कार,
                                   आपने रचना के मार्मिक पहलू को समझा आपका शुक्रिया. धन्यवाद.              

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 8, 2012 at 9:53pm

आदरणीय प्रदीप जी
               सादर, सब आपका ही आशीर्वाद है. आपने मेरे मन की उलझन को समझा आपका आभार धन्यवाद.

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 8, 2012 at 9:50pm

कुमार गौरव जी नमस्कार,
                                    आपको रचना पसंद आई. बहुत बहुत धन्यवाद.

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