For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

वो गया तो गया चांदनी भी गयी.
भागते सावनों की रजा रह गयी.

ज़ाहिरा जागते तीरगी सो गयी.
जाग जा अब न तेरी धमक रह गयी.

ज़िन्दगी रेत का ढेर थी बागवाँ
सामना आँधियों का न था, रह गई.

दोड़ते हाँफते रहगुज़र हम रहे
होंसले में कभी ना कमी रह गई

जानता था कि वो चापलूसी न थी
मिलन क़ी आरज़ू थी, रह गई.

या खुदा आसरा ताउम्र तू रहा
आजमा ले मुझे, ना कमी रह गई.

Views: 403

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on September 26, 2010 at 4:33pm
आदरणीय चेतन प्रकाश जी
आपका प्रयास अच्छा है| शायद आपने यह रचना तरही मुशायरे के लिए लिखी रही होगी| विलम्ब से पहुँचने के कारण शामिल ना हो सकी अन्यथा वहा इस पर विस्तृत चर्चा हो सकती थी| फिर भी जितना मै जनता हूँ ईमानदारी से आपके सामने रख रहा हूँ|
शिल्प के लिहाज से रद्दीफ़ और काफिये स्पष्ट ही नही है इसलिए इनके बारे में बात करना बेमानी होगा| बहर की कसौटी पर रखने पर अंत से दूसरे शेर का मिसरा ए सानी और अंतिम शेर का मिसरा ए ऊला बे बहर है|
कथ्य या खयाल की बात करे तो सभी शेरो में दोनों मिसरों में सामंजस्य की कमी दिखी|
उदहारण के लिए यदि यही शेर ले जो अच्छा बनते बनते रह गया|
ज़िन्दगी रेत का ढेर थी बागवाँ
सामना आँधियों का न था, रह गई.

पहले मिसरे में जिंदगी को आपने रेत का ढेर कहा ..फिर आप कहते है की आंधियों से सामना "न" था ..फिर जिंदगी को रेत का ढेर क्यूँ कहा? i
मेरा उद्देश्य दोष निकालना नही है हां परन्तु एक रचनाकार को गुमराह करना भी नही है| आशा है आप अन्यथा ना लेंगे|

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 24, 2010 at 8:05am
चेतन साहब, बहुत अच्छे ख्यालात का इज़हार किया है आपके अपनी रचना में ! ये शेअर तो वाकई कमल का है :
//ज़िन्दगी रेत का ढेर थी बागवाँ
सामना आँधियों का न था, रह गई.//
लेकिन आपकी ये रचना किसी तरह से भी ग़ज़ल शिल्प की परिधि में नहीं आती है, लिहाज़ा इसे शीर्षक वाली कविता कहें तो ज्यादा उचित होगा !
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on September 23, 2010 at 9:17pm
वो गया तो गया चांदनी भी गयी.
भागते सावनों की रजा रह गयी.

मैं भी बंधना चाहता हूँ राखी के बाद ये आपकी दूसरी खुबसूरत ग़ज़ल पढ़कर बहुत ही ख़ुशी हुई.....बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल है चेतन जी.....ऐसेही लिखते रहे...आशा है आगे भी निरंतर ऐसे ही आपकी रचनाएँ पढने को मिलती रहेंगी......

आपका ही अपना...
प्रीतम तिवारी(प्रीत)

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 23, 2010 at 9:32am
आदरणीय चेतन प्रकाश जी,
प्रणाम,
मैने आप की ओपन बुक्स ऑनलाइन पर प्रकाशित पहली रचना "मैं बांधना चाहता हूँ राखी" पढ़ा था, मुझे काफी अच्छी रचना लगी थी,
आज पुनः आपकी कृति "ग़ज़ल .......कमी रह गई" सामने है, मुवाफ कीजियेगा पर शीर्षक कुछ ऐसा लग रहा है कि "ग़ज़ल की कमी रह गई" यह रचना जो है दरअसल इसमे थोड़ी भी ग़ज़ल है ही नहीं, जितना मैं अभी तक समझा हूँ उसके हिसाब से ग़ज़ल के लिये कुछ नियम क़ानून बने है जिसको ध्यान मे रखकर ही ग़ज़ल कही जाती है, यहाँ तो ना मतला समझ मे आ रहा है ना काफिया और न ही रदीफ़, बहर की बात करना तो बाहर की बात है, यदि फिर भी आप इसे ग़ज़ल कहना चाह रहे है तो यह आपकी मर्जी आखिर रचना है आपका |
धन्यवाद |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"साथियों, आप सभी के बहुमूल्य विचारों का स्वागत है, इस बार के लिए निर्णय लिया गया है कि सभी आयोजन एक…"
11 hours ago
Admin posted discussions
12 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
12 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"नीलेश भाई के विचार व्यावहारिक हैं और मैं भी इनसे सहमत हूँ।  डिजिटल सर्टिफिकेट अब लगभग सभी…"
Friday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सादर नमस्कार, अब तक आए सभी विचार पढ़े हैं। अधिक विचार आयोजन अवधि बढ़ाने पर सहमति के हैं किन्तु इतने…"
Friday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"इन सुझावों पर भी विचार करना चाहिये। "
Thursday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"यह भी व्यवहारिक सुझाव है। इस प्रकार प्रयोग कर अनुभव प्राप्त किया जा सकता है। "
Thursday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"हाल ही में मेरा सोशल मीडिया का अनुभव यह रहा है कि इस पर प्रकाशित सामग्री की बाढ़ के कारण इस माध्यम…"
Thursday
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"आदरणीय प्रबंधन,यह निश्चित ही चिंता का विषय है कि विगत कालखंड में यहाँ पर सहभागिता एकदम नगण्य हो गयी…"
Thursday
amita tiwari posted a blog post

निर्वाण नहीं हीं चाहिए

निर्वाण नहीं हीं चाहिए---------------------------कैसा लगता होगाऊपर से देखते होंगे जबमाँ -बाबाकि…See More
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . .अधर

दोहा पंचक. . . . . अधरअधरों को अभिसार का, मत देना  इल्जाम ।मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम…See More
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी सदस्यों को सादर सप्रेम राधे राधे सभी चार आयोजन को को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। ( 1…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service