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मन की बुझी ना प्यास तेरे दीदार की...

मन की बुझी ना प्यास तेरे दीदार की
मन का था भ्रम या हद थी प्यार की ।

क्यूँ नहीं समझता ये दिल अपनी हदों कों
किया सब जो थी मेरी कूवत अख्तियार की।

जिद में क्यूँ कर बैठा तू ऐसी खता
कर दी बदनामी खुद ही अपने प्यार की ।

सुर्खरू हो जाता है तन-मन तुझे देख कर
सुध-बुध नही रही इसे अब संसार की ।

हर तमन्ना में बस तमन्ना है तेरे दीद की
कयामत की हद बना रखी है इंतजार की ।

जमाना चाहे जितने कांटे बिछा दे राहों में
'कमलेश 'जीत आखिर होगी मेरे प्यार की ॥

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Comment

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Comment by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on September 24, 2010 at 9:56pm
कुछ निजी व्यस्तता के कारण आप लोगों से दूर हूँ...फिर मिलेगे..ध्न्यवाद

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 23, 2010 at 10:52pm
कमलेश भईया बहुत दिनों के बाद OBO पर आप की ग़ज़ल आई है, अच्छी ग़ज़ल लगी, .
हर तमन्ना में बस तमन्ना है तेरे दीद की
कयामत की हद बना रखी है इंतजार की ।
वाह वाह बढ़िया शे'र लगा यह,उम्मीद है आगे भी आपकी और रचनायें तथा अन्य रचनाओं पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणियाँ प्राप्त होती रहेंगी |

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