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जब तुम रहते हो पास मेरे,
जग भरा भरा सा लगता है।
व्याकुल करती गर्मी के ऋतु में,
मलय समीर बहा लगता है।

चिलचिल करती कड़क धूप में,
बरगद का छांव मिला लगता है।
बारिस के मौसम में सिर पर,
मजबूत एक छत टिका लगता है।

कई दिनों से प्यासे मुख में,
शीतल नीर पड़ा लगता है।
कई दिनों से भूखे जन को,
मधुर भोज्य मिला लगता है।

एक अंधेरी अंजान गुफा में,
प्रकाश पुंज खिला लगता है।
कई जन्म से बिछड़ा प्रेमी,
इस जन्म में मिला लगता है।

किसी कुमारी के तन पर,
सुखद स्पर्श हुआ लगता है।
मरणासन्न रोगी के मुख में,
अमिय बिन्दु चुआ लगता है।

जब तुम रहते हो पास मेरे,
जग भरा भरा सा लगता है।

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 14, 2012 at 4:48pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी सराहना हेतु हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 14, 2012 at 4:46pm
आदरणीया महिमा श्री जी सराहना हेतु आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 14, 2012 at 4:45pm
सुरेन्द्र शुक्ला जी सराहना हेतु आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 12, 2012 at 7:00pm

कई दिनों से प्यासे मुख में,
शीतल नीर पड़ा लगता है।
कई दिनों से भूखे जन को,
मधुर भोज्य मिला लगता है।vaah bahut umda bhaav dil ko choo gaye.bahut sundar kavita.

Comment by MAHIMA SHREE on April 12, 2012 at 4:36pm
एक अंधेरी अंजान गुफा में,
प्रकाश पुंज खिला लगता है।
कई जन्म से बिछड़ा प्रेमी,
इस जन्म में मिला लगता है।
प्रिय विन्धेश्वरी भाई ,
बहुत खूब..सुंदर अहसासों को बुनती रचना...बधाई स्वीकार करे
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 8, 2012 at 12:10am


मजबूत एक छत टिका लगता है।

कई दिनों से प्यासे मुख में,
शीतल नीर पड़ा लगता है।
कई दिनों से भूखे जन को,

जब तुम रहते पास हो मेरे ..प्रणय गान ..सच में सब कुछ मिल जाता है ..मन खिल जाता है 
सुन्दर ....जय श्री राधे 
भ्रमर 5


Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 18, 2012 at 10:18pm
आभार आदरणीय जवाहर लाल जी।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on March 18, 2012 at 8:02pm

एक अंधेरी अंजान गुफा में,
प्रकाश पुंज खिला लगता है।
कई जन्म से बिछड़ा प्रेमी,
इस जन्म में मिला लगता है।

kya baat hai, mahoday ji. badhai

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 17, 2012 at 4:48pm
आभार आदरणीय डॉ. प्राची जी!
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 17, 2012 at 4:41pm
आदरणीय कुशवाहा जी आभार!

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