For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सूरज के विरुद्ध

षड्यंत्र रच 

आततायी कोहरे को 

निमंत्रण किस ने दिया 

कोई नहीं जानता 

ठण्ड खाया क़स्बा 

पथरा गया है 

हरारत महसूस होती है 

ज्वर हो तो ही 

अलाव तापते लोग 

दिखाई नहीं देते 

बस खांसते,खंखारते हैं 

बंद कमरों में 

सक्षम आदेश बिना ही 

अनधिकृत कर्फ्यू

जारी हो गया 

कस्बे में 

जमाव बिंदु से नीचे पहुंचे

पारे ने 

नलों का पानी ही नहीं 

जमा दिया

कस्बे की 

धमनियों का रक्त भी 

रजाई में दुबका क़स्बा 

उनींदा पड़ा रहेगा 

दिन भर 

मौसम को कोसता

इस आलसी 

आत्म समर्पण को 

ललकारती कोई आवाज़ 

एक दिन गूंजेगी कस्बे में 

उस दिन भी शायद

अंगडाई ही ले क़स्बा 

सूरज तुम कब आओगे 

इस कोहरे की चादर को 

फाड कर 

मैं उस दिन 

सूर्य नमस्कार के मन्त्र 

नहीं जपूंगा 

सीधा पी जाऊँगा तुम्हे 

आँखों से ही 

जागेगा ये उनींदा 

क़स्बा भी 

Views: 576

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on January 24, 2012 at 11:06pm

ए के राजपूत साहब अत्यंत आभार आप का 

Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on January 24, 2012 at 11:06pm

आभारी हूँ बागी साहब 

Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on January 24, 2012 at 11:05pm

सम्मान्य सौरभ पांडे साहब अत्यंत आभारी हूँ आप की विस्तृत सार गर्भित टिपण्णी के लिए ......क्षमा प्रार्थी हूँ देर से देखने के लिए 

Comment by AK Rajput on January 3, 2012 at 10:19am

सूरज के विरुद्ध

षड्यंत्र रच 

आततायी कोहरे को 

निमंत्रण किस ने दिया ...

सर्दी के इस मोसम में आपकी कविता से काफी तपिस महसूर हुई .
बहुत सुन्दर , बधाई

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 26, 2011 at 8:54pm

इस सर्दी में और भी सर्दी का एहसास कराती यह कविता, गहरे भाव को अपने आगोश में छुपाये हुए बहुत कुछ कह सकने में सामर्थवान है, बहुत बहुत बधाई अश्वनी कुमार शर्मा जी , बधाई स्वीकार करें |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 26, 2011 at 11:23am

सूरज तुम कब आओगे  / इस कोहरे की चादर को  / फाड कर  / मैं उस दिन  / सूर्य नमस्कार के मन्त्र  / नहीं जपूंगा  / सीधा पी जाऊँगा तुम्हे  / आँखों से ही

इन अद्भुत पंक्तियों के लिये अश्विनी कुमार शर्माजी आपको मेरा हार्दिक अभिनन्दन. 

प्रस्तुत अभिव्यक्ति के जरिये बहुत कुछ कह डाला है आपने.  ज्वाजल्यमान सूर्य से अपेक्षित व्यापकता को, सत्य है, किसी षड्यंत्र के अंतर्गत ही कुण्ठित किया जाता रहा है. परन्तु, यह भी सत्य है कि ऐसी तामसिक वेला को अधिक समय तक बनाये रख पाना किसी नकारात्मक वैचारिकता के वश में नहीं होता   --कुहरे छँटते ही हैं, प्रस्फुटित हो प्रकाश छिटकता ही है. आशाएँ उत्साहित होती ही हैं. सकारात्मकता बल पाती ही है. 

शीत प्रभावित वातावरण में आपकी इस रचना ने जीवन की गरमाई को रेखांकित किया है.  साधुवाद.

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं

तत्वं पूषण अपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये ..

इस सूर्य-मंत्र के आह्वान को आज कुछ और भी शिद्दत से महसूस कर पा रहा हूँ... .  अद्भुत ! अद्भुत !! .. . 

सहयोग बनाये रखें.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service