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कब से देखा है,

याद भी नही तब से देखा है,
इस मौसम को आते हुए
 
एक पहचान सी है
एक मरासिम भी कायम है
फिर भी नायाब सा
किसी हसीन अजनबी की तरह
जेरे लब एक मुस्कुराहट छोड जाता  है
जब भी आता है 
 
मौसमों की भीड़ से गुज़र कर 
अचानक किसी सुबह
हरशिंगार की खुशबू से 
यूँ मन को भिगोता है  
कि फिर किसी मौसम का 
रंग नही चढ़ता है.
 
एक बरस बाद 
आज फिर मद्धम है धूप
कहीं दूर आसमान में मानो 
पिघल रहा हो सूरज 
गए बरस की तुम्हारी उन रंज़िशों की तरह.

 

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Comment by धर्मेन्द्र शर्मा on October 16, 2011 at 4:03pm

बहुत सुन्दर..


गुज़री है एक उम्र मौसम का मिजाज़ समझने में
जिन्दगी के दुःख-सुख धूप छाँव हैं समझे ही नहीं

Comment by Aradhana on October 12, 2011 at 12:57pm

अरुण जी,

कई सालों से महसूस किया तब कहीं लफ्ज़ हाथ आए...इस बरस अनुभूति के साथ.

 

दिल से शुक्रिया,

 

सादर,

आराधना

Comment by Aradhana on October 12, 2011 at 12:54pm

आभार  सौरभ जी.
जी, प्रकृति मौन रह कर भी बहुत कुछ कहती है. कभी उसके संकेत समझ आजाते हैं कभी भरमा जाते हैं.
आपको कविता पसंद आई हम शुक्रगुज़ार हैं.
सादर,
आराधना

Comment by Abhinav Arun on October 12, 2011 at 10:30am

गहरे भावों की मधुर प्रस्तुति -

एक बरस बाद 
आज फिर मद्धम है धूप
कहीं दूर आसमान में मानो 
पिघल रहा हो सूरज 
गए बरस की तुम्हारी उन रंज़िशों की तरह.
प्रकृति के साथ रचनाकार का सुखद सुन्दर समन्वय !! हार्दिक बधाई !!!!

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 12, 2011 at 10:20am

हर अग्रसरित होता लम्हा किसी न किसी अनुभूति को जीता है. कुछ अनुभूतियाँ काल-तप्त पत्थर पर खिंची गहरी लकीर की तरह सदियों अपना वज़ूद बनाये रखती हैं. और कुछ तो उस पत्थर के खुद ही मूर्ति होजाने का कारण बन जाती हैं.  ऐसा ही क्षण किसी को  ’..काली कमरिया चढ़े न दूजो रंग’ या फिर  ’..तुम संग तोड़ .. कौन संग जोड़ूँगी..’  का उद्घोष करने को उत्प्रेरित करता है --

यूँ मन को भिगोता है  
कि फिर किसी मौसम का 
रंग नही चढ़ता है.

 

इस अपनत्व में दुलार है तो बिगाड़ भी है. किन्तु जो है उसपार है. इसपार तो बस संकेत भर है, संकेत है इकाई की--

पिघल रहा हो सूरज 
गए बरस की तुम्हारी उन रंज़िशों की तरह.

वाह !!

एक कालजयी क्षण को हामी भरती प्रस्तुत रचना बहुत गहरे आंदोलित करती है. 

रचना के लिये बधाइयाँ.

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