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आदरणीय योगी जी व आदरणीय सौरभ जी की प्रेरणा से जनित पाँच कह-मुकरियां :


(1)
बड़े प्यार से जो दुलरावै|
हमको अपने गले लगावै|
प्रीति-रीति में हम हों बंदी|
क्यों सखि साजन? नहिं सखि हिंदी!
_________________________


(2)

अलंकार से सज्जित सोहै|
रस की वृष्टि सदा मन मोहै  |
मिल जाता है परमानन्द |
क्यों सखि साजन? नहिं सखि छंद |

__________________________

(3)

परम संतुलित जिसका भार|
गुरु लघु रूप बना आधार!  
जन-जन को है जिसने मोहा|
क्यों सखि साजन? नहिं सखि दोहा!

___________________________

 

(4)

मेल जोल जिसका है गहना|
जैसे लिखना वैसे पढ़ना|
पूरी होती जिससे आशा
क्यों सखि साजन? नहिं निज भाषा!

_____________________________

 

(5)

दुनिया में जो प्रेम बढ़ावै|
जिसका साथ जिया हर्षावै|
राजनीति जिस पर हो गंदी|
क्यों सखि साजन? नहिं सखि हिंदी!
--अम्बरीष श्रीवास्तव

_____________________________

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Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 14, 2012 at 4:05pm

धन्यवाद अरुण जी, कह -मुकरियों को सराहने के लिए हार्दिक आभार .....सस्नेह 

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 14, 2012 at 3:28pm

भ्राताश्री वाह क्या बात है, अति सुन्दर पाँचों कह-मुकरियां. बधाई हो

Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 14, 2012 at 12:34pm

आदरेया सीमा जी,

प्रतिक्रया के माध्यम से आपका जो स्नेहाशीष मिला वह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है ....आपका हार्दिक आभार आदरेया ...

सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 14, 2012 at 12:32pm

आदरेया प्राची जी,

कह-मुकरियों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार .....आप जैसी विदुषी की सराहना पाकर अपना यह श्रम सार्थक हो गया है|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 13, 2012 at 4:28pm
आदरणीय अम्बरीश जी,
इन कह-मुकरियों की जितनी प्रशंसा की जाए कम है.
आप छंदों के सिद्धहस्त विद्वान् हैं, ये तो मुझे पता था, पर कह मुकरी जैसी विधा में छंदों का बखान, मातृ भाषा का गौरव और अभिमान, जिस खूबी से आपनें समेटा है, वो अद्भुत है. हार्दिक बधाई स्वीकार करें. सादर.
Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 24, 2011 at 8:25pm

आदरणीय अभिनव जी आपका हार्दिक स्वागत है ! सादर धन्यवाद !!

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 24, 2011 at 8:24pm

आदरणीय बागडे जी आपका हार्दिक स्वागत है ! कृपया धन्यवाद स्वीकार करें !

Comment by Abhinav Arun on October 2, 2011 at 3:16pm

हिंदी की महिमा का बखान करती इन रचनाओं के लिए साधुवाद अम्बरीश जी !! हर कह मुकरी शिल्प और कथ्य के दृष्टि से अनुपम है बहुत बढ़िया !!

Comment by AVINASH S BAGDE on October 1, 2011 at 4:00pm

दुनिया में जो प्रेम बढ़ावै|
जिसका साथ जिया हर्षावै|
राजनीति जिस पर हो गंदी|
क्यों सखि साजन? नहिं सखि हिंदी!.....SUPPPPPPER.

Comment by AVINASH S BAGDE on October 1, 2011 at 3:59pm

अलंकार से सज्जित सोहै|
रस की वृष्टि सदा मन मोहै  |
मिल जाता है परमानन्द |
क्यों सखि साजन? नहिं सखि छंद |......achchha chhand.....kya bat hai..Ambarish ji...saduwad

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