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रूठ गयी मुझसे प्रेयसी

आज पीने चला था जाम मैं,
प्रियतम ने प्याला थमा दिया|
चला था मैं इश्क लड़ाने,
उन्होने नज़रें झुका लिया|
कल्पना के हाथों से स्वयं
दो जाम बना दिया||
बड़ी नशीली आँखें उनकी,

मेरे मन मानस पर छा गयी|
श्यामल अंगूर की कोमल कलियों,
बीच शीशा लेकर आ गयीं|
नीर रसों के स्वाद ने मुझे
मधुघट की राह दिखा दिया|
मृदुल हथेली की चाहत ने,
उसे मादक द्रव्य बना दिया ||
एक बार ही तो था माँगा,
प्रेयसी, के अधरों की छुवन|
मगर उनकी मदहोशी मे ,
सारे जग को भुला दिया||

पर रूठ गयी मुझसे प्रेयसी,
करे कर जोड़ विनय मुझसे|
मुझको भूल जाओ ए स्वप्निल,
मय-महिफल मैने बसा लिया||
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी,
फिर बचा नही कुछ पीने को|
प्यास बुझाने की खातिर मैने,
अरमानों का श्राध करा दिया||
गम ना था रूठने का मुझे ,
क्योंकि उनके मान जानके इल्म था|
मगर तकदीर बेरहम ने की रुसवाई ,
कुचलकर मेरी हसरतों को उसने|
चंद फ़ासले को खाई बना दिया||


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Comment

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Comment by ABHISHEK TIWARI on August 14, 2010 at 4:31pm
ab ham kya batayen bhai jee log, ab ye to aaplogon ka pyar hi hai jo mujhe kabhi kabhi kalam uthane ko majbur karta hai , aur jab kalam uth jata hai to jo bhi aaya samajh me wahi likhta hu main , bas aur kuch nahi , dhanyawaad ,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 13, 2010 at 8:14am
अभिषेक जी , आप मे विचारो को पिरोने की क्षमता है , और जो विचारो को पिरोना जानते है वो लिखने की कला भी जानते है , प्रयास अच्छा है , और भी बढ़िया कर सकते है लिखते रहिये ,
Comment by आशीष यादव on August 12, 2010 at 9:29pm
bahut sundar
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 12, 2010 at 9:23pm
bahut badhiya abhishek bhai.....aap to achanak se chakka maar diye.....
humlog to intezaar me the ki aap itna dino baad aakar 1 ya 2 run lekin aapne to chakka hi maar diya....
bahut khoob.......jai hooooooooooooooooo
aisehi likhte rahe....

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