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इस्लाह हेतु एक ग़ज़ल |

तुझ बिन तो जन्नत भी सज़ा |
तेरे संग जहन्नुम, बज़ा |

तूने दिया गर दर्द तो,
फिर दर्द मे भी है मज़ा |

इक तुम मेरे ना हो सके,
अब ना बची कोई रज़ा |

तू भी कभी मेरी गली,
ग़लती से आ, आ के न जा |

'अंकुर' ये ज़िद अच्छी नही,
ना आएँगे वो, लौट जा |

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Comment by Sushant Jain 'Ankur' on September 6, 2011 at 11:22am

shukriya bagi ji ....


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2011 at 10:18am

अंकुर जी, आपने छोटी बहर पर गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है, प्रयास अच्छा है, मीटर को और बढ़िया से कसने की आवश्यकता है, चौथे शेर के मिसरा सानी में २ आ का प्रयोग दोष उत्पन्न करता हुआ प्रतीत हो रहा है, प्रयास करे आप बढ़िया कर सकते है , बधाई स्वीकारें |

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