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कविता = कहाँ आज़ाद हैं हम

कविता = कहाँ आज़ाद हैं हम

कहाँ आज़ाद हैं हम

हजारों हर तरफ ग़म

भ्रष्टाचार के टीले - पहाड़

और जनता की नित हार

अवनति का शोर 

घुप्प अन्धेरा घोर 

कहाँ उम्मीद 

गहरी नींद 

हुक्काम सो रहे 

हम रो रहे

यही थी तुम्हारी कल्पना ?

रामराज की ऐसी अल्पना ??

गरीबी अमीरी की ऐसी खाई

प्याज रोटी की  महंगाई

हमारी हाय में अब स्वर कहाँ है ?

हज़ारों प्रश्न हैं उत्तर उत्तर कहाँ है ??

                           == अभिनव अरुण

 

  

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on September 6, 2011 at 1:59pm

आदरणीय सर्वश्री अम्बरीश जी एवं आशीष जी हार्दिक आभार आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए उत्साहवर्धन है |शुक्रिया !

Comment by आशीष यादव on September 5, 2011 at 5:24pm

हुक्काम सो रहे 

हम रो रहे

यही थी तुम्हारी कल्पना ?

रामराज की ऐसी अल्पना ??

बिलकुल आज हकीकत पर कविता है|
बधाई

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 5, 2011 at 4:06pm

//हुक्काम सो रहे 

हम रो रहे

हमारी हाय में अब स्वर कहाँ है ?

हज़ारों प्रश्न हैं उत्तर उत्तर कहाँ है ??//

वाह भाई अरुण जी वाह ! आपने इन चन्द पंक्तियों में सभी कुछ कह डाला ! बहुत बहुत बधाई मित्र !

Comment by Abhinav Arun on August 31, 2011 at 9:20am

आदरणीय मोनिका जी आप की टिप्पणी स्वयमेंव एक काव्य रचना है प्रोत्साहित करती | साधुवाद !! आभार !!

Comment by monika on August 31, 2011 at 1:38am

बहुत सारे सवाल खड़े करती हे ये कविता और सोचने पर मजबूर हो जाते हे हम की हमारी आज़ादी क्या वाकई आज़ादी हे ....? हम तो आज भी गुलाम ही हे.

"करना हे घेराव तो दुखो का घेराव करो
बंद ही जो होना हे भ्रष्टाचार बंद हो
तोड़ फोड़ करनी हे तो तोडो वर्गभेद जिससे
आदमी पर आदमी का अत्याचार बंद हो"

Comment by Abhinav Arun on August 17, 2011 at 2:45pm

thanks rohit jee and thanks a lot to atendra jee !

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 17, 2011 at 12:27pm

हमारी हाय में अब स्वर कहाँ है ?

हज़ारों प्रश्न हैं उत्तर उत्तर कहाँ है ??

 

   sabse pahle aapko sadar pranaam ...aapne apni es kavita men us baat ko ujagar kiya hai jo hame aazadi ke baad bhi anekon prasn hamaare sammukh khada hai parantu uttar ke abhaw men aaj bhi prasnchinh  laga hua hai.............

      aapki rachana achhi lagi ....abhut bahut badhai.........

 

Comment by Rohit Sharma on August 17, 2011 at 11:00am

बेहतर

Comment by Abhinav Arun on August 16, 2011 at 12:59pm

सही कहा गणेश जी और अब समय आ गया है की आवाज़ उठाई जाए |

Comment by ganesh lohani on August 16, 2011 at 12:17pm

यही थी तुम्हारी कल्पना ?

रामराज की ऐसी अल्पना ??

गरीबी अमीरी की ऐसी खाई

प्याज रोटी की  महंगाई

आपने ठीक कहा हिंदुस्तान की अधिकतम जनता का यही हाल है |

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