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ग़ज़ल :- ये खबर इस शहर पे तारी हुई

 ग़ज़ल :- ये  खबर इस शहर पे तारी हुई 
 
यह खबर इस शहर पे तारी हुई ,
मछलियों  की जाल से यारी हुई |
 
फूल था मधुरस लुटा हल्का हुआ ,
तितली थी एहसास से भारी हुई |
 
आप किस्सागो नहीं  मालूम है ,
आपकी चुप्पी से दुश्वारी हुई |
 
लहरों के षड्यंत्र में फंसने लगी ,
नाव थी हालात  की मारी हुई |
 
रात भर तारों को हांका चाँद ने ,
सुब्ह को रुकने के लाचारी हुई |
 
द्रोह के  पासे सभी उलटे पडे ,
कब कहाँ और किससे गद्दारी हुई |
 
सुख में बच्चे बाप से लिपटे रहे ,
दुःख में माँ  के गोद की बारी हुई |
 
अब सभी को उसकी शादी की फिकर ,
बाप  के  बिन बेटी बेचारी हुई |
          
                      =   अभिनव अरुण
 
 
 
 
 

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on August 27, 2011 at 8:39am

THANKS SHANNO JI ! YAHI SHER MUJHE PASAND HAI SABSE ZYADA |

 

Comment by Shanno Aggarwal on August 26, 2011 at 9:04pm
बहुत खूब, अरुण...सभी शेर अच्छे लगे....

सुख में बच्चे बाप से लिपटे रहे ,
दुःख में माँ के गोद की बारी हुई |
Comment by Abhinav Arun on August 26, 2011 at 4:36pm

WELCOME  DUSHYANT JI AAPKA NAAM HEE KAAFI HAI ASAR KE LIYE !

 

Comment by दुष्यंत सेवक on August 26, 2011 at 3:01pm
बहुत आभार अरुण जी, बस मंच की परिपाटियों के हिसाब से खुद को संवार रहा हूँ
Comment by Abhinav Arun on August 26, 2011 at 2:57pm

वाह दुष्यंत जी क्या कहने वाह !! आपकी इस विस्तृत समीक्षा ने इस ग़ज़ल की गहराई और बढ़ा दी | आभारी हूँ आपका | स्नेह बना रहे | man to mera PRAFFULIT HO GAYA "" THANKS DUSHYANT JEE

Comment by दुष्यंत सेवक on August 24, 2011 at 1:25pm
यह खबर इस शहर पे तारी हुई ,
मछलियों की जाल से यारी हुई |
मौजूदा परिप्रेक्ष्य को उल्लेखित करती सटीक पंक्तियाँ

फूल था मधुरस लुटा हल्का हुआ ,
तितली थी एहसास से भारी हुई |
देने और पाने की अहमियत को दर्शाता सुन्दर शेर

आप किस्सागो नहीं मालूम है ,
आपकी चुप्पी से दुश्वारी हुई |
चुप्पी और किस्सागोई कुछ oxymoronic सा थॉट है.

लहरों के षड्यंत्र में फंसने लगी ,
नाव थी हालात की मारी हुई |
भारत के जनमानस की भी कुछ यही दास्तान है सर

रात भर तारों को हांका चाँद ने ,
सुब्ह को रुकने के लाचारी हुई |
मैं निशब्द हूँ...बेहद शानदार

द्रोह के पासे सभी उलटे पडे ,
कब कहाँ और किससे गद्दारी हुई |
फिर से मौजूदा परिप्रेक्ष्य को दर्शाती पंक्तियाँ साधुवाद

सुख में बच्चे बाप से लिपटे रहे ,
दुःख में माँ के गोद की बारी हुई |
संबंधों की चहल पहल को दर्शाता खुबसूरत शेर

अब सभी को उसकी शादी की फिकर ,
बाप के बिन बेटी बेचारी हुई |
अति सुन्दर अंजाम इससे बेहतर नहीं हो सकता था इस ग़ज़ल का
= अभिनव अरुण
और ये हैं अरुण जी जिन्होंने मन प्रफुल्लित कर दिया इस रचना को पोस्ट कर के...आभार आपका सर
Comment by आशीष यादव on August 24, 2011 at 10:31am
Lajwab. Upar aur niche dono tarf se dusre she'r mujhe behad achchhe lge. Upr se dusra to gahri chot kar rha h. Bahut bahut badhai is behtarin ghazal k liye.
Comment by आशीष यादव on August 24, 2011 at 10:30am
Lajwab. Upar aur niche dono tarf se dusre she'r mujhe behad achchhe lge. Upr se dusra to gahri chot kar rha h. Bahut bahut badhai is behtarin ghazal k liye.
Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 15, 2011 at 4:52pm

Ek se badkar Ek Sher .....Kya Baat hai Sir Ji......Badhai Swikaar Kare Atendra Ka........


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 15, 2011 at 4:23pm

इस ग़ज़ल के सभी शेर हर तरह से क़ामयाब हैं, अरुण अभिनव भाई. किस एक अशार का नाम लें. मतले से लेकर आखिरी अशार तक सभी के सभी मायनों से भरे और भारी.

बहुत-बहुत बधाई. 

 

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