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लौटा है कौन देख के जन्नत हरी भरी-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२


रहती हो जिसके साथ मुसीबत हरी भरी
कैसे हो उस की  यार  तबीयत हरी भरी।१।
*
वो भाग्यवान तात से जिसको मिले सदा
आशीष  लाड़  डाँट  नसीहत  हरी भरी।२।
*
सबने है आग द्वेष की सुलगा रखी बहुत
रखता है मन में  कौन मुहब्बत हरी भरी।३।
*
बढ़ता न ताप दुनिया का ऐसे कभी नहीं
रखते धरा को लोग जो औसत हरी भरी।४।
*
बाँटें दुखों के बोझ को मिलके सदा यहाँ
दो ईश खूब सब को ही नीयत हरी भरी।५।
*
हर ओर युद्ध मौत का फैला के जाल यूँ
करने में सब का जोर कयामत हरी भरी।६।
*
पुरखे थे राम सीख है जिन की यही हमें
रखना दिलों में प्यार की दौलत हरी भरी।७।
*
बातें हैं व्यर्थ आओ 'मुसाफिर' न फेर में
लौटा है कौन देख  के  जन्नत हरी भरी।८।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 1, 2024 at 7:48pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by Sushil Sarna on January 1, 2024 at 3:30pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल बनी है । हार्दिक बधाई सर ।नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऐं सर

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