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आजकल इस देश में-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

ये शिवालों से दुखी है आजकल इस देश में
वो हवाओं से दुखी है आजकल इस देश में।१।
.
भूखे रहने की  सलाहें  दे  रहा  भूखों को वो
जो निवालों से दुखी है आजकल इस देश में।२।
**
जिस को उत्तर सारे  के  सारे  पता हैं दोस्तो
वो सवालों से दुखी  है  आजकल इस देश में।३।
**
जो अँधेरों से बचा लाया था अपने-आप को
वो उजालों से दुखी  है आजकल इस देश में।४।
**
जो हमेशा बम की बातें सत्य करता शक्श वो
तीर भालों से  दुखी  है आजकल इस देश में।५।
**
पालकर जो मकड़ियों को साथ में रखता रहा
वो भी जालों से दुखी है आजकल इस देश में।६।
**
जो "मुसाफिर" है गड़ाये नीयतें ससुराल पर
वो ही सालों से दुखी है आजकल इस देश में।७।
.
मौलिक /अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 30, 2021 at 9:38pm

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन व त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने के लिए हार्दिक धन्यवाद। इंगित मिसरे को इस प्रकार देखें।

जो गड़ा नीयत "मुसाफिर" बैठे हैं ससुराल पर

Comment by Chetan Prakash on July 30, 2021 at 6:26pm

जाल भारी मछलियाँ जो तोड़कर ले जाती साथ

वो फँसा लेती शिकारी ही को अपने जबड़े में !

आदाब,  'मुसाफिर' साहब यही कहना चाहती है, आपकी  ग़ज़ल  ! कृपया  'शक्श को शख्स कर पाठ शुद्ध  करें और, हाँ 'नीयतें' का विकल्प कदाचित , मान्यवर, आपको  ढूढ़ना  होगा, सादर  ,,!

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