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हम नहीं सुधरेगे

वर्षा में नाले जाम है
नगर निगम वाले आते ही होंगें
दोषी , और मैं
क्या कह रहे है आप ?

मैंने क्या किया भाई
बस
घर के थोड़े से कचड़े
पोलीथिन में बाँध कर
नाले में इसलिए डाल दी
क्योकि ......
कचड़े का कंटेनर
मेरे घर से मात्र २०० फिट दूर है ॥

मैं अफसर हो कर
२०० फिट दूर क्यों जाऊ
नाक कट जायेगी मेरी
महल्ले वाले क्या कहेगे ॥


उधर , राजघाट पर
एक विदेशी सज्जन ने
लाइटर से सिगरेट जलाई
और राख एक पैकेट में रखने लगे
मैंने कहा ....
आप धुया भी पी जाइए
बात , उनकी समझ में आ गयी
उन्होंने सिगरेट बुझाकर
अपने पैंट के पॉकेट में रख ली ॥

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 19, 2010 at 10:14am
बब्बन भाई सही कहा आपने "हम नहीं सुधरेंगे" , थोड़ी सी अगर लोग अपने को सुधार ले तो बहुत सारी समस्याओं का सुधार स्वयम ही हो जाये , अच्छी रचना हम सबको इसपर अमल करने की जरूरत हैं |
Comment by आशीष यादव on July 18, 2010 at 9:39pm
कविता के माध्यम से आप बहुत सुघर ब्यंगात्मक बात लिखने बानी.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 18, 2010 at 1:14pm
सही कहा बबन भैया दूसरों पर उंगली उठाना बड़ा आसन होता है...पहले खुद के गिरेबान में झांक कर देखना होता है है कि हम क्या कर रहे है? जब तक प्रत्येक नागरिक इस बात को नहीं समझेगा इस देश का कल्याण नहीं हो सकता है.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on July 17, 2010 at 10:42pm
waah baban bhaiya bahut hi badhiya rachna.....baaton hi baaton me saari sachai ko ujagar kar diya aapne....

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