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याद तुम्हारी क्या बतलाऊँ
कैसे कैसे आ रही है

चलने का अंदाज़ ठुमक कर
मचल-मचल कर और चहक कर
हाथों को लहरा-लहरा कर
अदा-अदा से और विहँस कर

तेरी सुंदर-सुंदर बातें
मन हर्षित है गाते-गाते
मैं कब से आवाज दे रहा
आ जाते हँसते-मुस्काते

तेरे गालों वाले डिम्पल
याद आते हैं मुझको पल-पल
मिसरी में पागे होठों के
नाज़ुक चुम्बन कोमल-कोमल

एक छवि मुस्कान बटोरे
मुझको अपने परितः घेरे
सुंदर सुखद समीर बहाती
बदली बन कर छा रही है

याद तुम्हारी क्या बतलाऊँ
कैसे कैसे आ रही है 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 27, 2021 at 11:25am

आ. भाई आशीष जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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