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बह्र- फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाा

2122   2122  2122  2

ये हंसी ये मुस्कराहट कातिलाना है
हां तभी तुझपर फिदा सारा ज़माना है

लाॅक डाउन तोड़कर घर से निकलकर आ
देख तो मौसम बड़ा ही आशिकाना है

ये गदाईगीर का हो ही नहीं सकता
ये नगर के शाह का ही शामियाना है

बांटते थे ग़म खुशी आपस में पहले दोस्त
अब कहां माहौल वैसा दोस्ताना है

बेसबब हैं कैद घर में लोग हफ्तों से
कब रिहाई होगी इनकी क्या ठिकाना है

मेरे मालिक अब क़फ़स कोई नया दे दे
जिस क़फ़स में हूं मैं वो वर्षों पुराना है

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 22, 2020 at 2:15pm

आदरणीय समर कबीर साहब ग़ज़ल पर टिप्पणी करने और उत्साह वर्धन के लिए सादर आभार

Comment by Samar kabeer on May 21, 2020 at 12:01pm

जनाब राम अवध जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 20, 2020 at 5:20am

आदरणीय लक्ष्मण नामी मुसाफिर जी ग़ज़ल पर  सार्थक टिप्पणी के लिए आभार। अन्त में एक अक्षर अधिक होना  मेरे विचार से  जायज माना जाता है 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 19, 2020 at 3:59pm

आ. भाई राम अवध जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई । 

बांटते थे ग़म खुशी आपस में पहले दोस्त

ये मिसरा बेबह्र हो रहा है देखिएगा ..सादर

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